
कवर्धा-पंडरिया में कारगर नहीं जातीय समीकरण
कवर्धा . मुख्यमंत्री के गृहजिले के दोनों विधानसभा में भाजपा के विधायक हैं। कहा जाता है कि पिछले विधानसभा में दोनों ही विधायक जातीय समीकरण के तहत ही प्रत्याशी चुने बने। लेकिन यह बिलकुल ही स्पष्ट नहीं है। वहीं इस बार जातीय समीकरण थोड़ा डावाडोल भी दिखाई दे रहा है।
कवर्धा शहर में कुछ और ही चर्चाएं चल रही है, कि इस बार भाजपा पार्टी द्वारा कवर्धा या फिर पंडरिया विधानसभा में जातीय समीकरण में बदलाव कर सकते हैं। जातीय समीकरण को परे रखकर सामान्य वर्ग से किसी को प्रत्याशी बनाएंगे। क्योंकि लंबे समय से दोनों विधानसभा में केवल जाति आधारित प्रत्याशी ही रहे हैं। कवर्धा विधानसभा में साहू समाज से सबसे अधिक मतदाता है। बिरेन्द्रनगर विधानसभा था उस समय वहां पर साहू मतदाता अधिक थे, बावजूद कांग्रेस ही वहां पर बाजी मारती रही, वह भी बिना जातीय समीकरण। वहीं पूर्व में कवर्धा विधानसभा में भाजपा और कांग्रेस दोनों जीतते रहे, वह भी बिना जातीय समीकरण के। तो अब यह जातीय समीकरण कहां से पैठ जमा लिया। गौर करने वाली बात है कि क्या जातीय आधारित समीकरण का प्रभाव पड़ता है।
चुनाव परिणाम से समझे जातीय समीकरण
बिरेन्द्रनगर सीट पर 1993 में सियाराम साहू को भाजपा से जातीय समीकरण के तहत टिकिट मिला और जीते भी। इसके बाद 1998 में फिर से इन्हें ही टिकिट मिला, लेकिन हार गए। मोहम्मद अकबर जीत गए। यहां पर जातीय समीकरण काम नहीं किया। इसके बाद वर्ष 2008 में जब बिरेन्द्रनगर पंडरिया विधानसभा में बदला तो भाजपा ने जातीय समीकरण में कुर्मी समाज को प्रतिनिधित्व दिया। बावजूद मोहम्मद अकबर ने कुर्मी बाहुल्य विधानसभा में जीत दर्ज की। मतलब यहां पर भी जातीय फैक्टर काम नहीं आया। 2013 में भाजपा से मोतीराम चंद्रवंशी ने जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस से लालजी चंद्रवंशी थे। मतलब यह स्पष्ट ही नहीं है कि कवर्धा और पंडरिया विधानसभा में जातीय समीकरण के चलते मतदाता विधायक चुनते हैं।
जातीय समीकरण वास्ता नहीं
जातीय समीकरण कवर्धा विधानसभा क्षेत्र में वर्ष 2003 से प्रारंभ हुआ। इसके बाद पहले तक यहां पर कोई जातीय समीकरण नहीं चला था। वर्ष वर्ष 2003 व 2008 में भाजपा से डॉ.सियाराम साहू को टिकिट मिला और 2013 में अशोक साहू को। वहीं कांग्रेस में 2003 व 2008 में योगेश्वर राज सिंह को टिकिट दिया गया। जबकि 2013 में मोहम्मद अकबर को टिकिट मिला। मतलब यहां पर कोई जातीय समीकरण नहीं बैठता। बावजूद प्रत्याशी कहीं हारे तो कहीं जीते।
Published on:
19 Oct 2018 11:53 am
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