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पानी की समस्या, जर्जर स्कूलों पर अधिकारियों का ध्यान नहीं, क्या इस बार विकास यात्रा से बदलेगी जिले की तस्वीर

प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के गृह जिले में विकास का सफर सडक़ों तक ही समिति हो चुका है।

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प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के गृह जिले में विकास का सफर सडक़ों तक ही समिति हो चुका है। सडक़ जरूरी है लेकिन बुनियादी जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

कवर्धा . प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के गृह जिले में विकास का सफर सडक़ों तक ही समिति हो चुका है। सडक़ जरूरी है लेकिन बुनियादी जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। पानी, स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा सहित अन्य जरूरतों पर भी काम करने की आवश्यकता है।

मुख्यमंत्री इस बार विकास यात्रा में जिले के दोनों विधानसभा को कव्हर कर रहे और विकास को बता रहे हैं कि सांसद और उनके दो विधायकों ने क्या-क्या काम किए, लेकिन विकास रथ से जमीनी हकीकत दिखाई ही नहीं देता। मुख्यमंत्री का जिला होने के बाद भी जरुरी सुविधाओं के लिए जिलेवासी तरस रहे हैं, जिसकी आस 14 बरस पहले थी वहीं आस आज भी है। वनांचल में लोग पहले भी झिरिया का पानी पीते थे और आज भी पी रहे हैं। स्कूल आज भी शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं जो 14 वर्ष पहले था।अधिकारी व जनप्रतिनिधि अपने आप में रमे हुए हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण जिला मुख्यालय की जीवनदायिनी संकरी नदी है। जिस नदी में पहले पानी रहती थी। हजारों लोगों की निस्तारी होती थी वह नदी सूख चुकी है। वर्षों पुराने पुल तक को नहीं बनाया जा सका है।

जिले में 1611 शासकीय प्राथमिक शाला से हायर सेकण्डरी स्कूल संचालित है। लेकिन मुख्यमंत्री के गृह जिला होने के बाद भी शिक्षा विभाग भगवान भरोसे संचालित हो रहे हैं। इस वर्ष भी 209 स्कूल के बच्चे जान जोखीम में डालकर पढ़ाई करेंगे। क्योंकि जिस भवन में वे पड़ते हैं वह भवन जर्जर हो चुका है। जबकि विभाग ने 81 स्कूल भवन को तोडऩे योग्य भी बताया है। वहीं 5 हाई स्कूल व 4 हायर सेकण्डरी स्कूल भवन ही नहीं है। इसके चलते छात्र-छात्राएं अतिरिक्त कक्ष में पढ़ाई करने मजबूर है। इसी प्रकार जिले के 178 स्कूलों में लाईट ही नहीं है। यहां पर विकास कच्चा साबित होता नजर आ रहा है। शिक्षकों की कमी तो किसी से छुपी नहीं है।

जिले में विकास की रफ्तार इन 14 सालों में नहीं पकड़ सकी है। इसकी कारण जिलेवासी मूलभूत समस्या से जूझ रहा है। जिले का एक मात्र जिला अस्पताल में डॉक्टरों की कमी है। जिला अस्पताल इन दिनों रिफर सेंटर बन चुका है। इसकी प्रकार जिले के सामुदायिक व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टरों की कमी है। जिसका खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ता है। जिले के अधिकतर मरीजों को प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराना पड़ रहा है।

उच्च शिक्षा के लिए जिले में धड़ाधड़ कॉलेज खोले गए, लेकिन इन कॉलेजों में प्राध्यापकों की भारी कमी है। अतिथि शिक्षकों के भरोसे कॉलेज की पढ़ाई होती है। जिले के सात कॉलेज में एक भी कॉलेज ऐसा नहीं है जहां स्थायी प्राचार्य हो। सहसपुर लोहारा, पिपरिया, पांडातराई, बोड़ला, पंडरिया, पीजी कॉलेज, कवर्धा कन्या कॉलेज को प्रभारी प्राचार्य संभाल रहे हैं।

मुख्यमंत्री का जिला होने के बाद भी यहां के विकासखंड व नगर पंचायत विकास की रफ्तार से अछुते हैं। पंडरिया नगर व कवर्धा नगर को छोडक़र जिले के किसी भी नगर पंचायत व विकासखण्ड में सर्वसुविधा युक्त बस स्टैण्ड तक नहीं है। बोड़ला में लोग नेशनल हाईवे किनारे बैठकर बस का इंतजार करते हैं। लोहारा नगर में लाखों का बस स्टैण्ड करीब 5 वर्ष से अधूरा पड़ा हुआ है। पिपरिया, पांडातराई में बस स्टैण्ड तक नहीं है।

जिले में 11 हजार 75 हैण्डपंप है। इसी प्रकार नल जल योजना के तहत टंकी भी बनाया गया है। इसके बाद भी प्रत्येक वर्ष गर्मी प्रारंभ होते ही मैदानी क्षेत्र के लोगों को पानी के लिए भटकना पड़ता है, तो वनांचल के लोगों को पानी की समस्या के कारण झिरिया का पानी पीना पड़ता है। इन 14 वर्षों में प्रत्येक वर्ष होने वाली पानी की समस्या को दूर करने कोई ध्यान नहीं दिया गया है। इसी प्रकार जिले के आधे से अधिक आंगनबाड़ी केंद्र में बच्चों के पीने के लिए पानी तक नहीं है।