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मुक्ताकाशी मंच पर राधा कृष्ण संवाद को किया जीवंत, गणेश और सूर्य उपासना को दर्शाया- देखें वीडियो

- 49वें खजुराहो नृत्य समारोह का फागुन के रंगों की बौछार के साथ रंगारंग समापन

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खजुराहो। पत्थरों पर जिंदगी की दूब रोपी , हम सृजन का वेग हैं आकार हैं हम। खजुराहो में वाकई पत्थरों पर जीवंत शिल्प जिंन्दगी की रवानगी की मिसाल हैं। उस पर नव गति नव लय और नए ताल छंद भरते नृत्य भारतीय कला संस्कृति को एक उदात्त रूप में सामने लाते हैं । खजुराहो नृत्य समारोह का या स्वरूप दिलो दिमाग में लेकर दुनिया भर से आये सैलानी भरे दिल से अपने गांव और शहरों के लिए रवाना हुए।

रविवार को आखिरी दिन भी उन्होंने इस उत्सव का भरपूर आनंद लिया। गोपिका का मोहिनी अट्टम ,अरूपा और उनके साथियों की भरतनाट्यम ओडिसी और मोहिनीअट्टम की प्रस्तुति उनकी आंखों में समाई हुई थी तो पुष्पिता और उनके साथियों का नृत्य भी उनकी स्मृतियों से जाने वाला नही है।

रविवार को महोत्सव के आखिरी दिन नृत्य की शुरुआत गोपिका वर्मा के मोहिनीअट्टम से हुई। भारत की सांस्कृतिक दूत के रूप में विख्यात गोपिका ने गणेश स्तुति से अपने नृत्य की शुरुआत की। चित्रांगम् नाम की इस प्रस्तुति में उन्होंने नृत्यभावों से गणेश जी के स्वरूप को साकार किया ।

अगली प्रस्तुति भी मनोहारी थी। इसमें कृष्ण और रुक्मणी पासे खेल रहे है। तो रुक्मणी कृष्ण से कहती है कि अगर मैं ये खेल जीतती हूँ, तो आपको मुझसे ये वादा करना होगा कि आज के बाद आप किसी भी स्त्री को हाथ नहीं लगाएंगे, आप सिर्फ उन्हें देख सकते है पर स्पर्श नही कर सकते और कृष्ण ये बात मान जाते है। और वे जब खेलना शुरू करते है।

रुक्मणी जीत रही होती है, और कृष्णा डरे हुए है कि अगर हार गए तो किसी भी गोपस्त्री को स्पर्श नहीं कर पाएंगे। तो कृष्ण रुक्मणी की आँखों मे देखते है, जिसके कारण वो गलती करती है और रुक्मणी हार जाती है। इस पूरी कहानी के भाव को गोपिका ने बड़ी शिद्दत से नृत्यभावों में पिरोकर पेश किया। अंतिम प्रस्तुति में कृष्ण द्वारा रुक्मणी और गरुड़ के घमंड को तोड़ने की कहानी को भी गोपिका ने अपने नृत्य भावों में समेटकर दर्शकों के सामने रखा।

दूसरी प्रस्तुति में अरूपा लाहिरी और उनके साथियों के भरत नाट्यम ओडिसी और मोहिनीअट्टम नृत्य की प्रस्तुति हुई। तीन शैलियों के नृत्य की यह प्रस्तुति अनूठी थी। इस प्रस्तुति में अरूपा ने भरतनाट्यम, लिप्सा शतपथी ने ओडिसी दिव्या वारियर ने मोहिनी अट्टम शैली में नृत्य किया। अरूपा और उनके साथियों की पहली प्रस्तुति भगवान सूर्य को समर्पित थी।

सूर्य ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं । नृत्य के जरिए सूर्य की पूजा उपासना को बड़े ही सहज ढंग से उन्होंने पेश किया। उनकी दूसरी पेशकश काम पर केंद्रित थी। जीवन के चार पुरुषार्थो में एक काम भी है। नृत्य में अरूपा और उनकी साथियों ने काम के प्रभाव को श्रृंगार के भावों से पेश की। अगली प्रस्तुति में उन्होंने बताया कि कैसे स्त्री ऊर्जा द्रव और रचनात्मक्ता का प्रवाह है। नृत्य का समापन उन्होंने तिल्लाना से किया। सप्त मातृकाओं को समर्पित यह प्रस्तुति भी अनूठी रही।

समारोह का समापन पुष्पिता मिश्रा और उनके साथियों के ओडिसी नृत्य से हुआ। पुष्पिता और उनकी सरहियों में शुभांगी नायक, ज्योतिर्मयी षड़ंगी, आद्याशा मिश्रा, श्रीया श्रीपति, देवाशीष महापात्रा, शुभेंदु दास, सुष्मिता दास ने आरवी पल्लवी से नृत्य की शुरुआत की।

राग आरवी और एकताल में नृत्य का विस्तार अदभुत रहा। आंखों गर्दन धड़ और पैरों की धीमी गति तेज होती हुई जिस तरह चरम पर पहुंची तो लय और गति का अनूठा चित्रपट तैयार हो गया।
पुष्पिता की अगली प्रस्तुति उदबोधन की थी। राग ताल मालिका में सजी यह अभिव्यंजनात्मक प्रस्तुति थी जिसमे 'तुंग शिखरि चूड़ा" पर उन्होंने उड़ीसा के वैभव वहां की संस्कृति जंगल पहाड़ो आदि का नृत्यभावों से वर्णन किया।
सम्पूर्ण प्रस्तुति में नृत्य रचना पुष्पिता मिश्रा की ही थी। जबकि संगीत विकाश शुक्ल गुरु सच्चिदानंद दास एवं निमकान्त राउत्कर, और श्रीरामचंद्र बेहरे का था।