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यहां हर रोज होती है सावन सोमवार जैसी भक्ति, रावण भी कर चुका है यहां उपासना

अहिल्या बाई ने शिव को समर्पित कर महेश्वर राज्य का संचालन किया था।

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यहां हर रोज होती है सावन सोमवार जैसी भक्ति, रावण भी कर चुका है यहां उपासना

खंडवा/ महेश्वर. भगवान भूतभाव भोले शंकर की कृपा पाने के लिए भक्तों में सावन सोमवार को विशेष महत्व है। सावन में सोमवार को भगवान का अभिषेक, पूजन विशेष फलदायी माना जाता है, लेकिन महेश्वर में पूरी प्रजा पर भगवान शिव की कृपा बनाए रखने के लिए ये पूजन, अभिषेक वर्ष के 365 दिन होता है। सतपुड़ा और विंध्यांचल पर्वत मालाओं के बीच नर्मदा तट पर बसे महेश्वर में हर दिन सावन सोमवार जैसी भक्ति होती है। महेश्वर में आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र का विश्व प्रसिद्ध शास्त्रार्थ हुआ। इसी शास्त्रार्थ के बाद मिश्र ने शंकराचार्य का शिष्यत्व स्वीकार कर शंकाराचार्य के एकात्मवाद के सिद्धांत के प्रतिपादन के लिए उनके साथ चले गए है। शंकराचार्य द्वारों पर स्थापित चारों पीठों के प्रतीक भी महेश्वर में मौजूद हैं।

महेश्वर के पंडित प्रदीप शर्मा ने बताया कि प्रतिदिन शिवलिंगों का निर्माण, पूजन और अभिषेक की शुरुआत 250 वर्ष पहले है, जो अनवरत जारी है। प्रजा की खुशहाली के लिए रानी अहिल्या बाई ने इसे शुरू किया। आहिल्या बाई ने शिव को समर्पित कर राज्य का संचालन किया। प्रजा के अनुपात में सवा करोड़ शिवलिंगों का निर्माण पूजन और अभिषेक प्रतिदिन होता रहा है। कालांतार में इसे प्रतीक रूप में कर दिया गया, अब भी यहां 11 सेट में करीब हजार पार्थिव शिवलिंग प्रतिदिन निर्मित होते हैं। जिनका पूर्ण विधान से पूजन, अभिषेक और विसर्जन किया जाता है। शिव को समर्पित महेश्वर नगर में आज भी लोग चप्पे चप्पे पर भोलेनाथ की शिवलिंग स्थापित कर उन्हें जल चढ़ाते हैं।

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एकात्मवाद का प्रतिपादन

इतिहासकार जितेंद्र नेगी ने बताया कि वेदों में प्रचलित कथाओं के अनुसार मंडन मिश्र और शंकराचार्य का शास्त्रार्थ महेश्वर में ही हुआ। मिश्र ने परास्त होने के बाद आदि शंकराचार्य का शिष्यत्व स्वीकार किया और एकात्मवाद के विचार के प्रचार, प्रसार और स्थापना में लग गए। शंकराचार्य ने यहीं के शास्त्रार्थ के बाद चारों पीठों के स्थापना की शुरुआत की। श्रृंगेरी मठ चिकमंगलूर में स्थापित किया और मिश्र को पहला पीठाधीश्वर शंकराचार्य नियुक्त किया। बाद में गोवर्धन मठ, शारदा मठ और ज्योतिर्मठ, की स्थापना हुई। इन चारों पीठों के प्रतीक पीठ महेश्वर में हैं। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास जुड़े सुप्रिया गोस्वामी ने बताया महेश्वर ऐतिहासिक नगरी है। विश्व प्रसिद्ध मंडन मिश्र, शंकराचार्य का शास्त्रार्थ यहीं हुआ। शिव भक्ति के लिए इस नगर का साहित्यों में भी उल्लेख है।


रावण ने भी की थी महेश्वर में उपासना

वेदों के अनुसार महेश्वर देव निर्मित नगरी है। वेदों में यहां शिव उपासना के तथ्य मिलते हैं। भगवान भोले के अनन्य भक्त के रूप में विख्यात रावण ने भी यहां नर्मदा तट पर शिव उपासना की। हैहयवंशी राजा कार्तवीर्य अर्जुन भी यहां शिव रूप में पूजित है। राजा भर्तृहरि की तपोस्थली गुफा, अंगारा ऋषि का घाट, शबरी माता के गुरु मतंग ऋषि का आश्रम आज भी महेश्वर में विद्यमान है।

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