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यहां मन्नत पूरी होने पर कोठियों से घी तो कैरियां चढ़ाई जाती हैं चरण पादुका पर

मध्यप्रदेश खंडवा में बीड़ यानी संत सिंगाजी का धाम। यहां १० दिनी मेला शुरू है। मुख्य दिन शरद पुर्णिमा पर २ लाख भक्तों ने दर्शन किए।
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खंडवा/बीड. निमाड़ की आस्था के प्रतीक संत सिंगाजी महाराज की अखंड ज्योत और चरण पादुका के दर्शन करने के लिए बुधवार शाम से ही लंबी कतारें लगना शुरू हो गईं। मुख्य दिवस शरद पूर्णिमा के दिन लगभग 2 लाख श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य के दर्शन किए। श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ को देखकर प्रशासन भी सर्तक रहा। गुरुवार देर रात तक भक्तों का आना जारी रहा।
संत श्री सिंगाजी मेले के प्रमुख दिवस पर विभिन्न प्रदेशों से भक्त पहुंचे। मेले में 2 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचे। भक्तों ने अखंड ज्योत और चरण पादुका के दर्शन के लिए बुधवार शाम से ही कतारें लगानी शुरू कर दी थी। जो गुरुवार देर रात तक बनी रहीं। इस अवसर पर झाबुआ से मुख्य निशान आया। इसी प्रकार शिक्षा मंत्री विजय शाह ने भी निशान चढ़ाया। सुबह आरती का आयोजन हुआ। दोपहर १२ बजे से पहले मुख्य पुजारी ने भोग लगाया। इसके बाद रात में महाआरती का आयोजन हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ा। देर रात भक्त अपने आराध्य के दर्शन के लिए पहुंचते रहे। हरसूद जनपद की ओर से आयोजित कार्यक्रम में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी कड़े इंतजाम रहे। नर्मदा के बैक वॉटर को देखते हुए तैराक भी तैनात किए गए थे। मेले के दौरान रात में भव्य अतिशबाजी की गई। मुख्य निशान झाबुआ से आया।

मन्नत पूरी होने पर चढ़ाते हैं घी
संत सिंगाजी को पशुओं के गुरु के नाम से भी जाना जाता है। जब भी कोई पशु बीमार होता है तो उसका मालिक यहां आकर मन्नत मांगता है और उसकी मन्नत पूरी होने पर वहां उसके दूध से जो पहला घी बनता है लाकर यहां चढ़ाया जाता है। कोठियों से घी भरा जाता है।
हर साल सिंगाजी को चढ़ाते हैं कैरी
सिंगाजी गादी से नि:संतान महिलाओं को महंत के द्वारा कच्ची कैरी का फल दिया जाता है। धारकवाड़ी के किसान अजय सिंह मौर्य ने बताया कि लगातार 5 सालों से आज के ही दिन मेरे यहां झाड़ पर सिर्फ ९ कैरियां ही लगती हैं। जिन्हें सिंगाजी महाराज को समर्पित कर देता हूं। इस बार 10 लगी थीं। लेकिन एक रास्ते में ही गल गई।

नहीं लगा पशु मेला, परंपरा टूटी
संत सिगांजी के मेले को पशुओं का मेला भी कहा जाता है। हर साल उच्च नस्ल के बैल और कड़े यहां क्रय विक्रय के लिए आते थे। लेकिन इस वर्ष पशु मेले का आयोजन नहीं हुआ। इससे पशुपालकों व मेले में आने वाले लोगों को निराशा हुई। यहां पर पशु मेले में आने वाले उच्च नस्ल के बैलों को पुरस्कृत भी किया जाता था, जो इस वर्ष नहीं हो सका।