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निशान परंपरा… श्री दादाजी नाम भजते हुए महाराष्ट्र, पांडुर्ना से खंडवा दादाजी धाम के लिए निकले पदयात्री

-वर्ष 1958 में पांडुर्ना से महारानी के हाथी पर आया था दादाजी का निशान -मामा-भांजे के निशान के साथ चार अन्य निशान यात्राएं हुई शुरू -बैतूल, सौंसर, आमला, भैंसदेही, छिंदवाड़ा से भी निकलेंगे निशान
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खंडवा

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Manish Arora

Jul 05, 2026

guru purnima

खंडवा. पांडुर्ना से निकला मामा भांजे का निशान, वर्ष 1958 में पांडुर्ना से हाथी पर आया था निशान।

गुरु पूर्णिमा पर श्री दादाजी धाम में निशान चढ़ाने की परंपरा 74 साल पुरानी है। श्री दादाजी धाम में गुरु पूर्णिमा पर्व को लेकर जहां तैयारियां शुरू हो गई है। वहीं, महाराष्ट्र और पांडुर्ना से निशान निकलना भी शुरू हो गए है। बुधवार को निकला पांडुर्ना का सबसे पुराना 74 साल पुराना मामा भांजे का निशान रथ लेकर शुक्रवार को मुलताई तक पहुंच गया है। मामा पीयूष अरमरकर के साथ 11 वर्षीय भांजा मयंक गुरव निशान लेकर खंडवा आ रहे है।

1954 से हुई थी निशान लाने की परंपरा

श्री दादाजी धाम में निशान लाने की परंपरा की शुरुआत वर्ष 1954 में बैतूल बाजार से स्व. गंगाधर राव जोशी (बल्लू पटेल) ने की थी। इसके बाद पांडुुर्ना से घनश्याम चहुतरे ने निशान के साथ रथ यात्रा की शुरुआत की थी। पांडुर्ना से 1958 में पहला निशान हाथी पर खंडवा दादाजी धूनीवाले दरबार लाया गया था, जिसमें दादाजी की प्रतिमा भी शामिल थीं। यह हाथी हर्रई की महारानी के दरबार से विशेष रूप से दादाजी की सेवा के लिए निशान यात्रा में सजाकर भेजा गया था। पहली निशान यात्रा के छायाचित्र आज भी पांडुर्ना के हर घर में मौजूद है।


पांडुर्ना से छोटे दादाजी का गहरा संबंध

दादाजी भक्तों के अनुसार छोटे दादाजी महाराज श्री हरिहर भोले भगवान का पांडुर्ना से गहरा संबंध रहा है। वर्ष 1936 में छोटे दादाजी महाराज पांडुर्ना आए थे। यहां साईखेड़ा से दादाजी महाराज के साथ रहे नत्थुजी भगने (जी साहब) के यहां रुके थे। तीन शेर चौक स्थित दरबार में उन्हो अय्याबाबा को कुर्ता भेंट किया था। गुजरी चौक स्थित धर्माधिकारी परिवार के निवास पर हवन पूजन कर चरण पादुका और छड़ी प्रदान की थी। दादाजी महाराज की निशानी आज भी यहां सुरक्षित रखी हुई है। यहीं कारण है कि पांडुर्ना, सौंसर, बैतूल, छिंदवाड़ा, महाराष्ट्र में दादाजी महाराज के प्रति आज भी अटूट श्रद्धा बनीं हुई है।

65 साल तक मनोहर भाऊ ने संभाली परंपरा

पांडुर्ना से निशान लाने की परंपरा घनश्याम चहुतरे ने शुरू की थी। तब उनकी बहन इंदुबाई अरमरकर, जीजा सुदामा अरमरकर और 9 माह के मनोहर अरमकर अपनी मां की गोद में आए थे। तब से यह निशान मामा-भांजे का निशान कहलाने लगा। मनोहर भाऊ 65 साल तक निशान यात्रा लेकर आते रहे। वर्ष 2024 में निशान यात्रा से वापस लौटते समय उनका हृदय घात से आशापुर में निधन हो गया था। पिछले दो साल से उनके पुत्र पीयूष अरमरकर निशान ला रहे है। साथ में 11 वर्षीय भांजा मयंक भी है। मयंक 2 वर्ष की उम्र से निशान के साथ आ रहा है।

एक माह लगता खंडवा पहुंचने में

पांढुर्ना के निशान को खंडवा पहुंचने में करीब एक माह का समय लगता है। इस साल गुरु पूर्णिमा पर्व के लिए भक्तों का जत्था 1 जुलाई को निकला है। करीब 375 किमी की यात्रा करते हुए भक्तों का जत्था 28 जुलाई को खंडवा पहुंचेगा है। सबसे बड़ी बात ये कि यात्रा के दौरान कोई भी चप्पल या जूते नहीं पहनता है। लकड़ी से बने रथ को बारी-बारी सभी के द्वारा हाथों से खींचा जाता है।