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Success story: संघर्ष करते हुए घराने तक पहुंचीं, ध्रुपद गायन में बनाया बड़ा मुकाम

इस बेटी की ऊंची उड़ान...दो कमरे के मकान में रहकर सरकारी स्कूल से पढ़ीं हैं सोमबाला कुमार, पुरुष प्रधान गायकी में मनवा रही हैं लोहा, डागर घराने से निकलकर देशभर में दी प्रस्तुतियां

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खंडवा

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Amit Jaiswal

Jan 03, 2020

Success story Dhrupad vocalist of India Sombala Kumar

Success story Dhrupad vocalist of India Sombala Kumar

खंडवा. तलवडिय़ा-जावर से निकलकर ऊंची उड़ान भरना यूं आसान न था। संघर्ष करते हुए आगे बढ़ती रहीं और एक के बाद एक पायदान चढ़कर सफलता पाती गईं। आज धु्रपद गायन में ये बड़ा मुकाम बना चुकी हैं। देशभर के अलग-अलग मंचों पर इनकी प्रस्तुतियां हो चुकी हैं। पुरुष प्रधान गायकी के लिए माने जाने वाले ध्रुपद में ये अपना लोहा मनवा रही हैं। इनकी एक अलग ही पहचान है। सोमबाला कुमार धु्रपद की गायिका हैं। उन्होंने उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर के साथ अध्ययन किया, जो डागर घराने के वंश की 19वीं पीढ़ी के गायक थे। उन्होंने उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर के साथ भी अध्ययन किया। 1998 से खैरागढ़ यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में कार्यरत सोमबाला कुमार पुराने समय को याद करते हुए वे कहती हैं कि 8वीं तक तो हम जावर में पढ़े। पिताजी स्वरूपचंद सातले कृषक थे। 9वीं से महारानी स्कूल में पढऩे आई। मेरे पिताजी ने मालीकुआं पर दो कमरे किराए से लिए थे, उसमें हम रहते थे। 9वीं से 11वीं तक एक सब्जेक्ट म्यूजिक दिलाया था। फिर उसके बाद जीडीसी से एमए किया। यूनिवर्सिटी की टॉपर रही।

बड़े गुरु के साथ सीखने का मिला मौका
पहले मप्र-छत्तीसगढ़ एक साथ थे। मैंने अलाउद्दीन खां संगीत एकेडमी भोपाल में संगीत सीखने के लिए इंटरव्यू दिया। 5 ही प्रतिभागी चुने जाते थे। कुमार गंधर्व सहित कई बड़े नाम समिति में थे। मेरा सिलेक्शन हुआ है और जनवरी-1989 से मेरी शिक्षा शुरू हुई। स्कॉलरशिप तो सिर्फ 350 मिलती थी लेकिन इतने बड़े गुरु के साथ सीखने का मौका था। उस्ताद जिया मोईद्दीन दादर साब के साथ तालीम शुरू हुई। सुबह 4 बजे से क्लास शुरू होती थी। 8 बजे तक कंठ संस्कार की कक्षा शुरू होती थी। फिर दोपहर 2 बजे से शाम को जब तक उस्ताद की मर्जी है, तब तक रियाज करना है। साढ़े चार साल भोपाल में रही। उस्ताद की कृपा रही।

तानसेन, कुमार गंधर्व समारोह भी गाए
1993 में नेशनल स्कॉलरशिप के लिए इंटरव्यू दिया। ये अवॉर्ड होने के बाद उस्ताद ने मुंबई भेजा, उनके गुरुकुल में ही रही। 1996 में तानसेन समारोह गाया। जबकि 1992 में पहला ध्रुपद समारोह रविंद्र भवन में गाया था। तानसेन समारोह, कुमार गंधर्व समारोह भी गाए। उन्हें संगीत रत्न, सुरमणि अवार्ड मिल चुके हैं। अमरीका में भी उनके विद्यार्थी हैं।