खंडवा. निमाड़ के जंगल में भी पीले पलाश की महक फैली है। पीला पलाश बहुत कम पाया जाता है और जंगल के आस पास रहने वाले लोग इसे शुभ मानते हैं। हाल ही में इस पर शोध शुरू किया गया है। ऐसा मानना है कि पीले पलाश का उपयोग मधुमेह को कंट्रोल करने में भी किया जाता है। इसके पहले खरगोन जिले में पीले पलाश का पेड़ चिन्हित किया गया था। यहां वनस्पति शास्त्र की विभागाध्यक्ष डॉ. शकुन मिश्रा ने पंधाना और खालवा के जंगल से सटे इलाकों में पीले पलाश के पेड़ चिन्हित कर इन पर शोध शुरू किया है। उनका मानना है कि पलाश की यह प्रजाति मधुमेह समेत अन्य रोगों को दूर करने के काम आती है।
एक साथ कई पेड़
खालवा जनपद में चारवा रोड से अंदर जंगल की ओर तीन से चार पेड़ एक साथ लगे हैं। इनकी ऊंचाई करीब 30 फीट है और पेड़ में कम शाखाएं हैं। नारंगी और पीले पलाश के पेड़ की छाल में अंतर भी स्पष्ट दिखाई देता है। इसी तरह तेल्या बाबा के जंगल में एक पेड़ पीले पलाश का लगा है और इसके ठीक पास नारंगी पलाश का पेड़ भी है। गांव वाले बताते हैं कि कई वर्ष पुराना पेड़े है और यहां दोनों की छाल लगभग एक जैसी है। पंधाना रोड पर भेरूखेड़ा के खेत की मेढ़ पर एक पेड़ पहले पलाश का है, जिसकी लंबाई करीब 42 फीट है।
सर्वेक्षण में मिला पलाश
वनस्पति विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. सकुन मिश्रा का कहना है कि उन्होंने जनपद पंचायत खालवा और पंधाना के पीबीआर (पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर) के लिए किए गए सर्वेक्षण के दौरान पीले पलाश की प्रजाति देखी है। इसका वानस्पतिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा वैरायटी ल्यूटिया है। मप्र राज्य जैव विविधता अधिनियम 2004 के तहत सर्वेक्षण में नारंगी लाल और पीले पलाश पर अभी शोध कार्य चल रहा है।