
kishanagrh-खुद का गम भूल ओरों को बांट रही दर्द की दवा
कालीचरण
मदनगंज-किशनगढ़.
दूनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है, लोगो का गम देखा तो अपना गम भुल गए...यह गाने के गीत हिन्दी फिल्म अमृत के है। इस गाने के बोल अरांई की माया के जीवन पर सटीक साबित हो रहे है। परिवार की मााली हालत खराब होने और बचपन से दोनों पैरों से दिव्यांग माया यादव के दु:खों की लम्बी दास्ता है। जिन्हें वह याद कर आज भी रूहासी हो जाती है। लेकिन समय की मार से माया ने हिम्मत नहीं हारी और वह अब ऐसे बच्चों को शिक्षा की तालिम दे रही जो आर्थिक तंगी के कारण स्कूल नहीं जाते है। ताकि गांव को कोई बच्चा अनपढ़ रह ना सके।मूलत: किशनगढ़ के आजाद नगर निवासी माया यादव ने बताया कि जब वह एक साल की थी तो उसे बुखार हो गया और पोलियो के कारण दोनों पैर पोलियोग्रस्त हो गए। आर्थिक तंगी और परिवार की माली हालत खराब होने के कारण माया की शादी भी बड़ी बहनों के साथ और 3-4 साल की उम्र में ही कर दी गई। गोना नहीं होने के कारण वह पिता रामदयाल यादव और माता हगामदेवी के साथ पीहर में रूक गई और अपनी पढ़ाई में लग गई। माता पिता के साथ रहते हुए ही माया ने वर्ष 2002 में अपनी 12 वीं की पढ़ाई पूरी कर ली। घर में परेशानी होने पर माया ने साड़ी और सूट पर बुटिक बनाना सीखा और जल्द ही मोहल्ले की महिलाओं और युवतियों के कपड़ों पर बुटिक डिजाइन बनाना शुरू कर दिया और इससे होने वाली कमाई माता पिता को देने लगी। वर्ष 2002 से लगातार चार साल तक यह कार्य किया। वर्ष 2005 में माया को ससुराल अरांई (चौसला गांव) भेज दिया गया। गरीब और मुफलिसी के साए ने यहां भी माया का साथ नहीं छोड़ा और परिवार की तंगहाली के चलते उसने यहां पर लेडिज कपड़ों पर बुटिक डिजाइन करने का फिर से काम शुरू कर दिया।स्नातक की पढ़ाई पूरी कीससुराल में आने के बाद माया काफी निराश रहने लगी और आखिरकार उसने खुद में आत्मविश्वास जगाया और परिवार के भरण पोषण के साथ आगे की पढ़ाई भी पूरी करने का मनास बनाया। फिर क्या माया ने 14 साल बाद पढ़ाई शुरू की और अपनी बीए की डिग्री प्राप्त कर ली। वर्ष 2006 में वह आंगनबाड़ी में आशा सहयोगिनी के रूप में काम करना शुरू कर दिया। इसके बाद से माया लगातार गांव में चिकित्सा सर्वे करना, गर्भवती महिलाओं को चिकित्सकीय सेवाओं की जानकारी देने, स्वच्छता जागरुकता अभियान में सहयोग करने समेत बीमार लोगों को दवा दिलाने में मदद करना, गर्भवती एवं प्रसूताओं को विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य टीके लगाने और स्वस्थ्य पोषण की जानकारी देकर जागरुक करने का काम कर रही है। गांव में यदि रात में भी किसी महिला को उसकी जरुरत महसूस होती है और उनके बुलावे पर वह तत्काल अपनी ट्राईसाइकिल से पहुंच जाती है और जरुरी मदद करती है।महिला उत्थान से जुड़े कार्यों की संभाली बागडोरदोनों पैरों से दिव्यांग होने के बावजूद माया ने नारी उत्थान से जुड़े कार्य भी शुरू किए। उसने गांव की महिलाओं को संबल बनाने के लिए उन्हें सिलाई कढ़ाई का प्रशिक्षण दिलाने, बुटिक सेंटर से जोड़ कर काम दिलाने में भी मदद करती है। इसी तरह माया ने गांव की महिलाओं का एक मंडल भी बनाया। मंडल की प्रत्येक सदस्य प्रतिमाह 100 रुपए देती है। जो पैसा एकत्र होता है उससे जरुरतमंद बच्चों को भोजन और कपड़े वितरित किए जाते है। माया ने बताया कि वह वकालात करना चाहती है और जरुरतमंद महिला को मुफ्त में कानूनी सलाह और सहयोग देना चाहती है। माया संगीत की भी शोकिन है और वह ससुराल और पीहर में कई लोगों को डांस के स्टेप भी सीखा चुकी है।
Published on:
15 Mar 2020 01:28 pm
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