21 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Bani-Thani…कभी था देश विदेश में नाम, आज मदद की मोहताज

किशनगढ़ चित्र शैली को संरक्षण की जरूरत

2 min read
Google source verification
Bani-Thani...कभी था देश विदेश में नाम, आज मदद की मोहताज

Bani-Thani...कभी था देश विदेश में नाम, आज मदद की मोहताज

मदनगंज-किशनगढ़.
किशनगढ़ की पहचान जहां इन दिनों मार्बल मंडी के कारण बनी है वहीं पूर्व में यहां की चित्रकला भी देश विदेश में पहचान बना चुकी है। किशनगढ़ चित्रशैली की कृति बणी-ठणी (राधा) के चित्र प्रदेश ही नहीं बल्कि देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। कभी किशनगढ़ को विशेष नाम दिलाने वाली इस चित्रशैली को वर्तमान में संरक्षण की दरकार है। किशनगढ़ चित्रशैली का विकास महाराजा रूप सिंह के समय प्रारंभ हुआ और महाराजा सांवतसिंह के समय विकसित हुआ। महाराजा सांवतसिंह के समय ही किशनगढ़ चित्रशैली के चित्र बनाए गए। इसके बाद विश्व प्रसिद्ध राधा (बणी-ठणी) की कृति का चित्र कलाकार निहालचंद ने सन 1778 में बनाया था। किशनगढ़ शैली के चित्रकारों में निहालचंद मोरध्वज, अमरचंद, सीताराम, नानकराम, रामनाथ और जोशी सवाईराम का नाम प्रमुख रूप से शामिल है। महाराजा सांवतसिंह जो बाद में संत नागरीदास के रूप में प्रसिद्ध हुए उनकी रचनाओं पर किशनगढ़ चित्रशैली के कई चित्र बने। यह चित्रशैली लगभग ३०० वर्ष से अधिक पुरानी मानी जाती है। कला विशेषज्ञों की नजर में इसे मोनालिसा के चित्र के मुकाबले का माना जाता है।
बणी-ठणी के कारण प्रसिद्ध
इतिहासकार अविनाश पारीक ने बताया कि किशनगढ़ चित्रशैली चित्रकला के क्षेत्र में स्वतंत्र शैली मानी जाती है। राधा कृष्ण इसका प्रमुख विषय रहा है। किशनगढ़ चित्रशैली को प्रकाश में लाने का श्रेय एरिक डिकिन्सन, डॉ. फैयाज अली और कार्ल खंडालावाला को जाता है। इसकी विशेषताओं में पुरूषाकृति में लंबा छरहरा बदन, उन्नत ललाट, लंबी नाक, पतले होंठ, खंजनाकृत कानों तक खिंचे हुए विशाल नयन प्रमुख है। वहीं नारी आकृति में गौर वर्ण, बांके काजल से युक्त विशाल नयन, उन्नत ललाट, बड़ी तीखी सुंदर नासिका, सुराहीदार गर्दन आदि है। इसके साथ ही प्राकृतिक परिवेश का भी बड़े स्तर पर उपयोग शामिल है। इसमे झील, पक्षी, नौकाएं, कमल दलों से ढके जलाशय शामिल है। इसमे प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया गया है।
डाक टिकट भी जारी
केंद्र सरकार ने किशनगढ़ की बणी-ठणी शैली में राधा का चित्र लेकर ५ मई १९७३ में एक डाक टिकट भी जारी किया। इससे भी किशनगढ़ की चित्रकला की प्रसिद्धि बढ़ी।
चित्र शैली के लिए चिंतित
किशनगढ़ चित्र शैली के कार्य करने वाले वरिष्ठ चित्रकार शहजाद अली का कहना है कि किशनगढ़ चित्रशैली को विशेष सरंक्षण की जरूरत है। नए लोग इस चित्रशैली को सीखने आएंगे तो यह बच पाएगी।
आर्ट गैलरी की आवश्यकता
किशनगढ़ के पुराने शहर में करीब दो दशक पूर्व बड़ी संया में चित्रकारों की बड़ी संया थी। आर्थिक संरक्षण नहीं मिलने के कारण चित्रकार दूसरे काम करने लग गए। चित्रकार बिरदीचंद मालाकार ने कहा कि बिना राजकीय संरक्षण के कला विकसित नहीं हो सकती है। इसलिए चित्रकला को संरक्षण और प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है।