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मार्बल स्लरी बन सकती है उद्योगों के लिए संजीवनी

स्लरी है कैल्शियम का स्त्रोत, इस्तेमाल से स्थानीय उद्योगों को मिल सकता है संबल आत्म निर्भर राजस्थान की दिशा में हो सकती है पहल

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मार्बल स्लरी बन सकती है उद्योगों के लिए संजीवनी

मार्बल स्लरी बन सकती है उद्योगों के लिए संजीवनी

मदनगंज-किशनगढ़ (अजमेर).

मार्बल स्लरी प्रदेश के कई उद्योगों के लिए संजीवनी साबित हो सकती है। स्लरी में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम होने से इसका उपयोग प्रदेश की सीमेंट फैक्ट्रियों, पशु आहार, मुर्गी दाना और रंग रोगन में इस्तेमाल होने वाले कलर पेंट के साथ ही वाल पुट्टी जैसी सामग्री में इसका उपयोग किया जा सकता है। वर्तमान में अनुपयोगी इस स्लरी की बड़ी खपत टाइल्स इंडस्ट्रीज में भी की जा सकती है। यदि राज्य सरकार इसे प्रोत्साहित करे तो यह आत्म निर्भर राजस्थान की दिशा में पहल बन सकती है। इससे ना केवल स्थानीय उद्योगों को संबल मिलेगा, बल्कि स्थानीय बेरोजगारों के लिए नई इंडस्ट्रीज रोजगार का एक साधन भी बन सकती है।

राज्य सरकार ने बजट घोषणा में अजमेर जिले को सेरेमिक हब बनाने का ऐलान तो कर रखा है, लेकिन वर्तमान समय तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। किशनगढ़ समेत अजमेर जिले के लिए यह अनुपयोगी मार्बल स्लरी एक वरदान साबित हो सकती है। इस स्लरी से केवल स्थानीय उद्योगों को संबल नहीं दिया जा सकता, बल्कि सेरेमिक टाइल्स के रूप में नई इंडस्ट्रीज भी खड़ी की जा सकती है। टाइल्स उद्योग विकसीत किए जाने के साथ ही प्रदेश की सीमेंट फैक्ट्रियों, पशु आहार फैक्ट्रियों, मुर्गी दाना बनाने की फैक्ट्रियों और रंग रोगन के लिए बनाए जाने वाले कलर पेंट और वाल पुट्टी या प्लास्टर ऑफ पेरिस की भांति इसका सदुपयोग भी किया जा सकता है। मूर्ति उद्योग के लिए भी यह कारगर साबित हो सकती है। जरुरत है तो केवल सरकार के प्रोत्साहन की। ताकि नए उद्यमी सामने आए और मार्बल स्लरी से विकसित किए जाने वाले उद्योगों में अपनी रूचि दिखाए।

रोज निकलती हजारों लीटर स्लरी

मार्बल औद्योगिक क्षेत्र से रोजाना हजारों लीटर मार्बल और ग्रेनाइट की स्लरी निकलती है जो कि अनुपयोगी है और उसे डम्पिंग यार्ड में डाला जाता है। सामान्यतय 5000 लीटर क्षमता के करीब 800 से 900 टैंकर रोज स्लरी मार्बल और ग्रेनाइट फैक्ट्रियों से निकलती है। लेकिन फिलहाल इसमें कुछ कमी हुई है और वर्तमान में 300 से 350 टैंकर ही स्लरी के निकल रहे है। मार्बल और ग्रेनाइट फैक्ट्रियों से रोज निकलने वाली स्लरी को डम्पिंग यार्ड में डाला जाता है।

डम्पिंग यार्ड की स्थिति

पुराना डम्पिंग यार्ड : चतुर्थ फेज के पर्यावरण रोड पर यह डम्पिंग यार्ड है। यह वर्ष 2005 में शुरू। यह करीब 330 बीघा क्षेत्रफल में फैला है और करीब 40 फीट गहरा है।
नया डम्पिंग यार्ड : टूंकड़ा रोड पर बना है। वर्ष 2010 में शुरू हुआ। इसका क्षेत्रफल करीब 360 बीघा है और गहराई करीब 20 फीट है।

यह उद्योग हो सकते है विकसित

मार्बल स्लरी के इस्तेमाल से किशनगढ़ में या अजमेर जिले में कही भी प्रदेश की सबसे बड़ी सेरेमिक इंडस्ट्रीज (सेरेमिक टाइल्स) विकसित की जा सकती है। इसके साथ ही मार्बल और ग्रेनाइट स्लरी में काफी मात्रा में कैल्शियम होता है। इसी कैल्शियम की उपलब्धता से स्लरी का उपयोग सीमेंट फैक्ट्रियों में सीमेंट बनाने में उपयोग किया जा सकता है। इसी तरह पशु आहार और मुर्गी दाने में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। कलर पेंट बनाने या वाल पुट्टी बनाने में भी उपयोग किया जा सकता है। प्लास्टर ऑफ पेरिस की भांति मूर्ति बनाने, सड़क निर्माण में गड्ढ़ों को भरने में भी इस्तेमाल (अन्य मिट्टी के स्थान पर उपयोग) किया जा सकता है।

बेहतर फिल्मी शूटिंग लोकेशन

मार्बल स्लरी से भरे यह डम्पिंग यार्ड बर्फीली वादियों सा नजर आता है। इससे यह प्रदेश का बेहतर फिल्मी शूटिंग लोकेशन स्थल के रूप में भी विकसित हो सकता है। यहां प्री वेंडिंग शूटिंग, कई फिल्मी गानों और सीरियल की शूटिंग के साथ ही विज्ञापनों की शूटिंग भी हो चुकी है।