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अधिक आर्थिक सहायता के वादे और रुझान में बदलाव ने पश्चिम बंगाल में निभाई अहम भूमिका

आखिरकार पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार सत्ता हासिल कर ली। करीब 15 साल से सत्ता पर काबिज रही तृणमूल कांग्रेस को भाजपा ने विधानसभा चुनावों में पटखनी दे दी। राज्य में भाजपा की बड़ी कामयाबी के पीछे कई कारक जिम्मेदार रहे हैं। कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, घुसपैठ, तुष्टीकरण जैसे मुद्दों ने चुनावी नतीजों की दिशा तय कर दी।

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अधिक आर्थिक सहायता के वादे और रुझान में बदलाव ने पश्चिम बंगाल में निभाई अहम भूमिका

अधिक आर्थिक सहायता के वादे और रुझान में बदलाव ने पश्चिम बंगाल में निभाई अहम भूमिका

आखिरकार पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार सत्ता हासिल कर ली। करीब 15 साल से सत्ता पर काबिज रही तृणमूल कांग्रेस को भाजपा ने विधानसभा चुनावों में पटखनी दे दी। राज्य में भाजपा की बड़ी कामयाबी के पीछे कई कारक जिम्मेदार रहे हैं। कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, घुसपैठ, तुष्टीकरण जैसे मुद्दों ने चुनावी नतीजों की दिशा तय कर दी। अधिक आर्थिक सहायता के वादे और रुझान में बदलाव ने अहम भूमिका निभाई। इससे राज्य में महिलाओं की चुनावी पसंद को नया आकार मिला।

तृणमूल को भाजपा से करारी हार का करना पड़ा सामना

अधिक आर्थिक सहायता राशि के वादे और मतदाताओं के रुझान में बदलाव ने संभवत: महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस कारण विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को भाजपा से करारी हार का सामना करना पड़ा। राज्य के मतदाताओं में से लगभग आधी संख्या महिलाओं की है और उन्हें लंबे समय से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी की एक मजबूत ताकत माना जाता रहा है। तृणमूल कांग्रेस सरकार ने चुनाव से पहले लक्ष्मीर भंडार योजना के तहत वित्तीय सहायता बढ़ा दी जिसे सत्तारूढ़ पार्टी का महिलाओं के लिए राजनीतिक रूप से सबसे प्रभावशाली कल्याणकारी कार्यक्रम माना जाता था। सामान्य वर्ग के लिए यह सहायता 1,500 रुपए प्रति माह और आरक्षित वर्ग के लिए 1,700 रुपए प्रति माह कर दी गई। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में प्रस्तावित अन्नपूर्णा योजना के तहत 3,000 रुपए की मासिक सहायता देने का वादा किया था जिससे संभव है कि तृणमूल की महिला मतदाताओं के बीच उसकी उल्लेखनीय पैठ बनी। तृणमूल कांग्रेस ने 2011 से ही चुनाव में महिला मतदाताओं की अधिक भागीदारी पर जोर दिया है।

महिलाओं की मतदान दर 92.69 प्रतिशत

निर्वाचन आयोग के एक अधिकारी के अनुसार, इस वर्ष के पहले चरण के मतदान में 152 निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाओं की मतदान दर 92.69 प्रतिशत रही, जो पुरुषों की 90.92 प्रतिशत मतदान दर से अधिक है। हालांकि, दूसरे चरण के मतदान के आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं जिसमें 142 सीट पर मतदान हुआ था। नाम गुप्त रखने की शर्त पर अधिकारी ने कहा, हम विभिन्न क्षेत्रों से आंकड़े एकत्र कर रहे हैं। विस्तृत विश्लेषण के बाद स्थिति स्पष्ट होगी। तृणमूल के एक नेता ने कहा कि सोमवार को घोषित चुनाव परिणामों से इस रुझान में बदलाव के संकेत मिले हैं। वर्ष 2021 के चुनाव के मतदानोत्तर विश्लेषण से पता चला था कि लगभग दो करोड़ महिलाओं को लक्ष्मीर भंडार योजना से प्रत्यक्ष लाभ मिला था जिसके तहत उन्हें प्रति माह 500 से 1000 रुपए तक की राशि प्रदान की गई थी।

केवल वित्तीय सहायता से चुनावी निष्ठा सुनिश्चित नहीं

तृणमूल नेता ने समर्थन में गिरावट के कारणों के रूप में महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर जनता के गुस्से, अनसुलझे हाई-प्रोफाइल मामलों, भर्ती में भ्रष्टाचार के आरोपों और स्थानीय नेतृत्व स्तर पर कथित अहंकार जैसे कारकों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा, यह धारणा कि केवल वित्तीय सहायता से चुनावी निष्ठा सुनिश्चित की जा सकती है, कमजोर होती दिख रही है। महिला मतदाता शासन और जवाबदेही पर अधिक जोर देती दिख रही हैं। उन्होंने कहा, वर्ष 2021 में लगभग 55-58 प्रतिशत महिला मतदाताओं ने तृणमूल का समर्थन किया था। इस बार स्थिति बदलती दिख रही है। वित्तीय प्रोत्साहन अभी भी प्रासंगिक हैं लेकिन शायद अब वे एकमात्र निर्णायक कारक नहीं रह गए हैं। उन्होंने कहा, व्यापक बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। कल्याणकारी योजनाओं को चुनावी प्रोत्साहन के बजाय अधिकार के रूप में देखा जा रहा है।