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दुर्भाग्य पीछा नहीं छोड़ रहा विश्व प्रसिद्ध उपन्यास ‘आलो अंधारी’ की लेखिका बेबी हालदार का

विश्व प्रसिद्ध उपन्यास 'आलो अंधारी' की लेखिका वेट्रेस (नौकरानी) बेबी हालदार की जिंदगी आज भी अंधेरे में है। 15 साल की उम्र में 3 बच्चों की मां बनने वाली बेबी के जीवन में खलनायक के तौर पर कैंसर ने अपना पांव जमा लिया है। बचपन से आधी उम्र तक एक-एक पैसे के लिए तरसने वाली बेबी आज भी एक-एक पैसे के लिए मोहताज हैं।

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दुर्भाग्य पीछा नहीं छोड़ रहा विश्व प्रसिद्ध उपन्यास 'आलो अंधारी' की लेखिका बेबी हालदार का

दुर्भाग्य पीछा नहीं छोड़ रहा विश्व प्रसिद्ध उपन्यास 'आलो अंधारी' की लेखिका बेबी हालदार का

केडी पार्थ .

विश्व प्रसिद्ध उपन्यास 'आलो अंधारी' की लेखिका वेट्रेस (नौकरानी) बेबी हालदार की जिंदगी आज भी अंधेरे में है। 15 साल की उम्र में 3 बच्चों की मां बनने वाली बेबी के जीवन में खलनायक के तौर पर कैंसर ने अपना पांव जमा लिया है। बचपन से आधी उम्र तक एक-एक पैसे के लिए तरसने वाली बेबी आज भी एक-एक पैसे के लिए मोहताज हैं। मददगार के तौर पर कोई सामने नहीं आ रहा। मुहल्ले और आसपास के लोगों ने सौ, हजार रुपए देकर कुछ मदद जरूर की, पर राज्य सरकार और केंद्र के कानों में जू तक नहीं रेंगी। बंगाल के राज्यपाल डॉ. सीवी आनंद बोस कुछ मेहरबान जरूर हुए। उनकी ओर से मदद के तौर पर मिले 40-50 हजार रुपए से एक महीने तक इलाज का खर्च उठाया गया। पर धधकते तवे पर एक बूंद पानी की तरह यह धन साबित हुआ। बेबी को यह चिंता सता रही है कि पता नहीं अब उनके जीवन का क्या होगा? कितने दिन जिंदा रहेंगी। मर गई तो उनके बच्चों की जिंदगी क्या होगी। क्या फिर उनके बच्चों को भी वही जिल्लत वाली जिंदगी जीनी पड़ेगी जो उन्होंने जी है। यह सब सोचकर बेबी हताश और परेशान हैं।
बेबी ने बताया कि उनकी लिखी किताब 'आलो अंधारी' एनसीआरटी में शामिल है। लाखों-करोड़ों बच्चे इस किताब को पढक़र प्रेरित हो रहे हैं। उनके जीवन में उजाला फैल रहा है, लेकिन मेरी जिंदगी फिर से अंधेरी हो गई है। उन्हें आज यह सोचना पड़ रहा है कि कल की दवा कहां से आएगी? घर का खर्च कैसे चलेगा। हर महीने इलाज पर कम से कम 20 हजार रुपए खर्च हो जाते हैं। एमआरआई समेत अन्य जांच कराने पर यह खर्च 30-35 हजार रुपए से भी ज्यादा हो जाता है। कमाई का कोई साधन नहीं है। पब्लिशर्स से भी कोई ज्यादा रॉल्टिी नहीं मिल रही है। इस संकट में केंद्र और राज्य सरकार से ही कुछ मदद मिलने की उम्मीद लगाए बैठी हूं। मदद मिल जाए तो कुछ और दिनों तक जिंदा रह सकती हूं। बेटा-बेटी की शादी करनी है। तीन बच्चों में बड़ा बेटा अपने पिता के साथ रहता है। छोटा बेटा और बेटी उनके साथ है। ये दोनों दिल्ली में एक निजी कंपनी में काम करते थे। उनकी बीमारी के कारण उनका छोटा बेटा फिलहाल उनके साथ ही रहता है। नौकरी चली गई है। बेटी दिल्ली में रहकर कुछ काम कर रही है। लेकिन उसको वेतन बहुत कम मिलता है। उसकी ही कमाई पर घर का खर्च चल रहा है।

'आलो अंधारी' की लेखिका बेबी हलदर ने अपनी पुस्तक में अपने जीवन की घटना को प्रस्तुत किया है। इसमें उनके जीवन संघर्ष की कहानी है। आइए एक नजर डालते हैं उनकी कहानी पर। सौतेली मां, पति से धोखा खाने के बाद वेट्रेस बेबी की जिंदगी कैसे आगे बढ़ी। बचपन से ही बेबी शराबी पिता और सौतेली माँ द्वारा प्रताडि़त हो रही थी। 12 साल की उम्र में उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध विवाह करना पड़ा। फिर पति के अत्याचार से जीवन कष्टमय हो गया। बेबी हलदर अपने तीन बच्चों के पति से अलग हो गई। बाद में जीवन को जीने और पेट भरने के लिए वह गुडग़ांव चली गईं और वहां कामवाली बाई के रूप में काम करना शुरू किया। वहीं रहते हुए वह मुंशी प्रेमचंद के पोते प्रोफेसर प्रबोध कुमार के घर काम करने लगी। यहां से बेबी की किस्मत बदली। एक लेखक के पोते ने उसे लेखक बना दिया। हुआ यह कि काम करने के दौरान प्रबोध कुमार के घर की लाइब्रेरी से किताबें उठाकर बेबी बीच-बीच में पढ़ती और किताबों को बड़े ध्यान से देखती थी।
बेबी की रुचि देखकर प्रबोध कुमार ने उन्हें एक डायरी दी और उस डायरी में जिंदगी के दर्द के बारे में लिख डालने को कहा। पिता और सौतेली माँ की प्रताडऩा से लेकर अनिच्छा से शादी तक, सब कुछ उनकी कहानी में आया। नाबालिग के रूप में अपने पति के साथ पहले संभोग के भयानक और दर्दनाक अनुभव के बारे में भी उन्होंने लिखा। जिस उम्र में लड़कियां 13 साल की उम्र में स्कूल जाती हैं, उस उम्र में अपने पहले बच्चे को जन्म देने का अनुभव को भी साझा किया। उनकी यह डायरी उनके खोए हुए बचपन और किशोरावस्था की अनकही पीड़ाओं की कहानियों से भरी हुई है। डायरी का लेखन अंतत: एक किताब बन गया। पहली पुस्तक का नाम 'आलो अंधारी' रखा गया।

पुस्तक के छपते ही उन्हें देश के लोगों से ढेर सारा प्यार मिला। एक के बाद एक उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हुईं। बेबी की किताब बेस्टसेलर बन गई। बेबी का नाम देश से विदेश तक फैल गया। बेबी की किताबों का 14 विदेशी भाषाओं सहित कुल 27 भाषाओं में अनुवाद किया गया है। पहली किताब के प्रकाशन के बाद कुछ पैसा हाथ में आया। यहां भी बेबी की शिकायत है कि पब्लिशर्स ने जितना कमाया उतना उन्हें नहीं मिला। फिर भी उनके पैसे से ही वे बंगाल के उत्तर चौबीस परगना जिले के हालीशहर में घर बनाई। खुद सात कक्षा तक पढऩे वाली बेबी ने अपने दो बच्चों को हायर सेकंडरी तक एजुकेशन दिलवाया। लेकिन बच्चों को भी ज्यादा नहीं पढ़ा पाई।

बेबी बताती है कि कलकत्ता की यौन कर्मियों के जीवन से जुड़ी चौथी किताब पूरी कर ली गई है। उसे छापने के लिए भेज भी दिया गया है। पांचवी पुस्तक पर काम कर रही है। लेकिन बीमारी उसे काम नहीं करने दे रहा है। एकाध-लाइन लिखने के बाद आगे बढ़ नहीं पाती है। बेबी हलधर का मूल घर मुर्शिदाबाद के जलांगी में है। हालाँकि, बेबी के पिता सेना में कार्यरत थे, इसलिए उनका जन्म कश्मीर में हुआ। पिता शराबी थे। जब वह चार साल की थी तभी उनकी मां उन्हें छोडक़र भाग गई। फिर बच्ची के पिता ने दूसरी शादी कर ली। सौतेली माँ की प्रताडऩा के साथ ही पढ़ाई भी बंद कर दी गई। बेबी तब केवल 12 वर्ष की थी। बेबी के पिता ने दोगुनी उम्र के व्यक्ति से शादी कर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।