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बंगाल ने ही रखी बॉलीवुड में सुरताल की नींव

1930 के दशक में बंगाल ने बॉलीवुड को कुछ ऐसे ही रतन दिए जिन्होंने आधुनिक गीत- संगीत की मौजूदा परंपरा की नींव रखी। इनमें संगीत निर्देशक, गायक रायचंद बोराल और पंकज मल्लिक मुख्य थे।

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pankaj mullick and kl saigal

बंगाल ने ही रखी बॉलीवुड में सुरताल की नींव

बंगाल ने ही रखी सुरताल की नींव
कोलकाता
बोलती फिल्मों का दौर आया तो संगीत, गीत बॉलीवुड की फिल्मों में सफलता के पैमाने बनने लगे। शुरुआती दौर में अभिनेता, अभिनेत्रियों की सफलता का मापदंड उनकी आवाज के रास्ते से तय होता था। यह वही दौर था तब देश आजाद नहीं हुआ था, आयातित तकनीक जुटाना आसान काम नहीं था। प्रगतिवादी समाज अभी खुलकर सामने नहीं आया था, उसे रुढि़वादिता की खिडक़ी से अपनी तांक झांक कर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी पड़ती थी। मनोरंजन के नए माध्यम के रूप में सिनेमा अपनी जड़ें मजबूत कर रहा था। 1930 के दशक में बंगाल ने बॉलीवुड को कुछ ऐसे ही रतन दिए जिन्होंने आधुनिक गीत- संगीत की मौजूदा परंपरा की नींव रखी। इनमें संगीत निर्देशक, गायक रायचंद बोराल और पंकज मल्लिक मुख्य थे। बंगाल की शस्य श्यामला धरती पर जन्में दोनों संगीत विषारदों ने बॉलीवुड के संगीत जगत को अपनी शुरुआती रचनात्मक्ता से खासा प्रभावित किया। रायचंद बोराल ने जहां भारतीय शास्त्रीय गायन परंपरा से जुड़े विभिन्न अलंकारों को पॉपुलर स्वरूप प्रदान किया। वहीं पंकज मल्लिक ने भद्र समाज की बेडिय़ों में जकड़े रवीन्द्रसंगीत को आम लोगों तक फिल्मों के गीतों के माध्यम से पहुंचाया।
बोराल ने जहां ठुमरी, कीर्तन, अखराई, कविगान जैसी अर्धशास्त्रीय विधाओं को सामने रखकर गीत संगीत की रचना की। बोराल यहीं नहीं रुके उन्होंने शास्त्रीय वाद्य यंत्रों जैसे सितार, सरोद, सारंगी और बांसुरी के साथ फिल्म संगीत में वॉयलन, सेक् सो फोन, फ्ल्यूट की जुगलबंदी कराई। जिसपर उससमय के परंपरावादियों ने सवाल उठाए। लेकिन बोराल हार मानने वालों मे ंनहीं थे। हार मानते भी क्यों न्यू थिएटर जैसा बैनर जो उनके साथ मौजूद था। न्यू थिएटर के बारे में पहले भी लिखा जा चुका है। लेकिन पाठकों को यह बता दें कि न्यू थिएटर ने बॉलीवुड के पहले कुनबे कपूर परिवार के पितृपुरुष पृथ्वीराज कपूर को सितारा बनाया। न्यू थिएटर ने ही देश को केएल सहगल के रूप में पहला सुपर स्टार दिया। भारतीय गीत परंपरा के साथ प्रयोग कर उसे जन जन तक पहुंचाने में जितना परिश्रम बोराल ने किया वह आने वाली संगीत निर्देशक की पीढिय़ों के लिए प्रेरणा बना।

वहीं न्यू थिएटर से ही जुड़े पंकज मल्लिक ने एक और साहसी कदम उठाया। रवीन्द्रसंगीत जो उस दौर तक पंरपरावादियों की जकडऩ में था, उसे आम लोगों तक पहुंचाने का काम मल्लिक ने किया। खुद रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा कि उनके लिखे गीतों को सुर में गूंथने के लिए पंकज मल्लिक ही उपयुक्त हैं। उन्होंने मल्लिक को अपने गीतों को सुरबद्ध करने का दायित्व भी सौंपा।


न्यू थिएटर के रतनद्वय बोराल और मल्लिक ने विकसित होती तकनीक के साथ हमेशा कदमताल मिलाया। यही वजह है कि 1934 में बनी चंडीदास में भारतीय सिनेमा के इतिहास में पहली बार पाश्र्व संगीत का इस्तेमाल किया गया और अगले ही वर्ष 1935 में बोराल ने फिल्म धूपछांव में पहली बार पाश्र्व गायन का इस्तेमाल किया। मील का पत्थर बने दोनों संगीतकारों ने दर्जनों हिंदी, बांग्ला व अन्य भाषाओं में बनी फिल्मों, रेडियो और रिकार्ड कम्पनियों के लिए गीत तैयार किए। जवाहर लाल नेहरू की उपस्थितिमें मल्लिक का गाया राष्ट्रगान जन गण मण को सार्वजनिक समारोहों के लिए आदर्श बताया गया। तब से लेकर आज तक मल्लिक के गाए राष्ट्रगान की तर्ज पर ही राष्ट्रगान गाया जाता है।

मदन साहब की यादें
बात गीत संगीत की हो तो जेएफ मदन की 1932 की फिल्म इंद्रसभा की चर्चा जरूर होगी। कोलकाता के फिल्म निर्देशक मदन साहब की इंद्रसभा में रिकार्ड ६९ गाने थे। एक साल पहले 1939 में ही मदन साहब की आई फिल्म शिरी फरहाद में 42 गाने थे। उस दौर में ओपेरा में गाए गीतों को ही फिल्म में जगह दे दी जाती थी।

मदन साहब की यादें
बात गीत संगीत की हो तो जेएफ मदन की 1932 की फिल्म इंद्रसभा की चर्चा जरूर होगी। कोलकाता के फिल्म निर्देशक मदन साहब की इंद्रसभा में रिकार्ड ६९ गाने थे। एक साल पहले 1939 में ही मदन साहब की आई फिल्म शिरी फरहाद में 42 गाने थे। उस दौर में ओपेरा में गाए गीतों को ही फिल्म में जगह दे दी जाती थी।