
मां दुर्गा की प्रतिमा बना विरासत को संभाला महिला मूर्तिकार ने
कोलकाता (शिशिर शरण राही). वैसे तो दुर्गा पूजा की तैयारी कोलकाता सहित पूरे बंगाल में उमंग-उत्साह के साथ अंतिम चरण में है, लेकिन मां दुर्गा के कुछ ऐसे भी भक्त हैं, जो उनके आगमन की तैयारी पूरे साल करते है। इन्हीं में शुमार है कोलकाता के कारीगरों की टोली के नाम से मशहूर कुमारटुली, जिनकी मेहनत से प्रत्यक्ष रूप में हर जगह दुर्गा विराजमान होती है। कुमारटुली के मूर्तिकार न केवल देश, बल्कि विदेश में भी प्रसिद्ध हैं। कुमारटुली को भारत में सबसे अधिक देवी प्रतिमा बनाने का गौरव हासिल है। जिस तरह फिल्मों के लिए सत्यजीत रे, कविताओं के लिए गुरुदेव रवीद्रनाथ टैगोर विख्यात हैं, उसी तरह कुमारटुली दुर्गा प्रतिमा बनाने के लिए मशहूर है। अक्सर कुमारटुली की जब बात होती है, तो बिना कमीज पहने, पसीने से लथपथ शरीर और मिट्टी से सराबोर पुरुषों के हाथ हमारी आंखों के सामने नजर आते हैं, पर इनके बीच किसी महिला मूर्तिकार की कल्पना करना असंभव लगता था। इस सोच को चाइना पॉल ने दूर कर दिखाया। दुर्गा पूजा से पहले कुम्हारटोली में दुर्गा प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में व्यस्त चाइना ने गुरुवार को पत्रिका संवाददाता के साथ खास भेंट में अपने अनुभव साझा की। अपने माता-पिता की चौथी संतान चायना की मां ने उनका यह नाम इसलिए रखा था क्योंकि उन्हें और बेटियां नहीं चाहिए थी। बांग्ला में चाइना का मतलब है.....नहीं चाहिए। कहा जाता है कि कला का कोई धर्म, जाति या ***** विशेष नहीं होता और यह कुमारटुली की चाइना पर चरितार्थ साबित होती है। चायना 17 साल की उम्र से इस कला से जुड़ी हुई है। इस कला पर पुरुषों की अधिक सत्ता होने के बावजूद उन्होंने इस क्षेत्र में अपना एक अलग मुकाम बनाया। चायना की कहानी 1994 के उन दुर्भाग्यपूर्ण दिनों से शुरू होती है जब उनके पिता बहुत ज्यादा बीमार रहने लगे।
----70 साल से विरासत का पेशा
70 साल से मूर्ति बनाने के काम में लगे उनके परिवार में पिता के बाद कोई भी मूर्तिकार नहीं बचा। चायना ने बताया कि 2 भाईयों में से कोई इस काम को नहीं अपनाना चाहता था और न ही 3 बहनें। इस हालत में अपने परिवार के इस पारंपरिक मूर्ति कला को बचाए रखने का बीड़ा उन्होंने उठाया, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती पुरुष प्रधान इस पेशे में अपने पैर जमाने की थी। उनके पिता के गुजर जाने के बाद ग्राहकों को ये शंका थी कि क्या एक महिला इतनी मेहनत और बारीकी का काम कर पाएगी? अपनी लगन और एकाग्रता से उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया। अब कला के जानकार उन्हें 10 भुजा के नाम से संबोधित करते हैं। आज भी वे उसी पारंपरिक तरीके से मूर्तियां बनाती है, जैसे उनके पिता और दादाजी बनाया करते थे। पहले उनके पास 12 कर्मचारियों की टीम थी, जो अभी 9 है। वे अपने सभी कारीगरों का बहुत ध्यान रखती हंै। केवल प्रसिद्धी और प्रशंसा ही नहीं, उन्हें कई बार आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा। पिछले साल जब पारंपरिक मान्यताओं को चुनौती देते हुए चायना ने एक किन्नरों के समूह के लिए अर्धनारीश्वर के रूप में दुर्गा की मूर्ति बनाई तो मीडिया में जहां उनके इस कदम की सराहना हुई, वहीं इसके विपरीत कुछ स्थानीय लोगों ने परम्पराओं को तोडऩे के लिए उनकी आलोचना की। सवालों के जवाब में चाइना ने कहा कि पहले यहां निषिद्धो पाली के रज के रूप में सोनागाछी की मिट्टी का उपयोग होता था, पर अब नहीं होता। दैवीय प्रतिमा में निषिद्धो पाली की मिट्टी के इस्तेमाल की प्रथा खुद में समाज सुधार के सूत्र भी सहेजे हैं। ये प्रथा पुरुषों की भूल की सजा भुगतती औरत के उत्थान और आदर की प्रक्रिया का हिस्सा है।
------भारत सरकार ने भेजा था इस साल चीन
उनके यहां बनी दुर्गा प्रतिमाओं की मांग न केवल कोलकाता, बल्कि बंगाल के विभिन्न शहरों सहित झारखंड से सटे पुरुलिया और केरल आदि दूसरे प्रदेशों तक है। इसी साल चाइना पॉल 13 जून को चीन गई थीं। चीन के क्विनिंग टाउन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी में उन्होंने चीन में साज-सज्जा, श्रृंगारित कर आकर्षक रूप दिया। रने के लिए उन्हें भारत सरकार की ओर से भेजा गया था। वे अपने साथ २ फीट ऊंची मां दुर्गा और काली की प्रतिमा भी साथ ले गई थी, जिसे उन्होंने चीन में साज-सज्जा, श्रृंगारित कर आकर्षक रूप दिया।
Published on:
09 Oct 2018 04:49 pm
बड़ी खबरें
View Allकोलकाता
पश्चिम बंगाल
ट्रेंडिंग
