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Corona Lockdown: सिटी ऑफ जॉय से ‘जॉय’ नदारद

जिंदादिल महानगर झेल रहा है वीरानी का कहर महानगर का नाम भले कलकत्ता से कोलकाता हो गया, मगर मूल निवासी और यहां की संस्कृति में रचे बसे विभिन्न प्रांतों के प्रवासी बातचीत में प्यार, रुआब और मिठास के साथ इसका उच्चारण कलकत्ते ही करते हैं... कहते हैं कलकत्ते की बात ही निराली है...कितना लगाव है कलकत्ते से। अंग्रेजी में उक्ति है रफ एण्ड टफ...! बस यही इस शहर की धड़कन है।  

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Corona Lockdown: सिटी ऑफ जॉय से 'जॉय' नदारद

Corona Lockdown: सिटी ऑफ जॉय से 'जॉय' नदारद

राजेन्द्र शेखर व्यास
कोलकाता. सिटी ऑफ जॉय से 'जॉय' नदारद है...और, जॉय वाली सिटी 'स्विच ऑफ' है...! घातक कोरोना वायरस नोवेल कोविड-19 के संक्रमण का खतरा बढ़ता जा रहा है। सरकार अंकुश के हर संभव प्रयास कर रही है। लॉकडाउन से हालात ऐसे प्रतीत हो रहे हैं मानो बंग प्रदेश और इसकी सांस्कृतिक राजधानी कोलकाता की रगों से रक्त सूख गया हो। वायरस के कोप ने जिंदादिल शहर ही नहीं प्रदेश के गांव, नगर, कस्बों की जीवंतता छीन ली है।
कहते हैं कि जिसने एक बार फिल्म, कला, संस्कृति, धर्म, गीत-संगीत, शिक्षा, इतिहास के साथ ही नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जैसे स्वाधीनता सैनानी और रामकृष्ण परमहंस जैसे दिव्य महापुरुष की इस धरा पर पैर धरा तो वह कलकत्ते को कभी न भूल पाया। महानगर का नाम भले कलकत्ता से कोलकाता हो गया, मगर मूल निवासी और यहां की संस्कृति में रचे बसे विभिन्न प्रांतों के प्रवासी बातचीत में प्यार, रुआब और मिठास के साथ इसका उच्चारण कलकत्ते ही करते हैं... कहते हैं कलकत्ते की बात ही निराली है...कितना लगाव है कलकत्ते से। अंग्रेजी में उक्ति है रफ एण्ड टफ...! बस यही इस शहर की धड़कन है। इसीलिए तो कवि नीलकमल की ये पंक्तियां...
आदमी नहीं रहते, रंग रहते हैं कलकत्ते में।
आदमी नहीं लड़ते, रंग लड़ते हैं कलकत्ते में...।।
इस महानगर की जीवंतता का प्रमाण हैं। यह वह शहर है, जहां अमीर और गरीब की खाई कहीं नजर नहीं आती। गरीब भी अमीर से उसी अंदाज में बात करता है जिस अंदाज में अमीर बोलता है। अमीर भी गरीबों के साथ खचाखच भरी ट्रेन और खस्ताहाल लोकल बस में सफर करते हुए ठहाके लगाता है...दूरियां दरकिनार हैं...! तभी तो भीड़ भरे बाजारों में लोग एक दूसरे से सटते-टकराते-फिसलते निकल जाते हैं और कोई छींटाकशी नहीं, गरमा-गरमी नहीं, कोई नोंकझोंक नहीं। सामान्य बात है। परन्तु...!!!
आज यह शहर वीरानी का वह दंश झेल रहा है मानो मौत की दहशत में किसी प्राचीन सभ्यता का नजारा देख रहे हों...! शहर की शान ट्राम की गडगड़़़ाहट-सरसराहट नहीं सुनाई दे रही...बाजारों से चिल्लपों गायब है...हर गली, मोहल्ला सूना है...विशाल सड़कें, चौराहे, चौपाटियां, नुक्कड़, गंगा के तीर...क्या, क्या बताएं... चौतरफा सन्नाटा...सन्नाटा... और, सन्नाटा। वीरान बाजार में इक्का-दुक्का लोग निकलते हैं तो भी सहमे-सहमे से... नजर मिलते ही स्पष्ट नजर आता है भय और मौत का खौफ चेहरे पर। यही माहौल है फिलहाल यहां का...नहीं देखा इस शहर ने ऐसा कभी।
रवीन्द्र सदन, एकेडमी ऑफ फाइन आट्र्र्स, टॉलीवुड, हजारों दुकानों वाला पुस्तक बाजार कॉलेज स्ट्रीट, पूर्वी भारत में थोक व्यापार का सबसे बड़ा केन्द्र बड़ा बाजार, अलीपुर स्थित माँ काली मंदिर और चिडिय़ाखाना, गंगा किनारे बेलूर मठ, दक्षिणेश्वर मंदिर, समुद्रतटीय पर्यटन क्षेत्र दीघा एवं मंदारमणि, धर्मतल्ला स्थित भारतीय संग्रहालय, सुंदरवन अभयारण्य, पहाडिय़ों की गोद में बसा दार्जिलिंग आदि सदा आबाद रहने वाले स्थल वीरान और खामोश हैं। विख्यात ईडन गार्डन्स से हाउजेट की गूंज नदारद है। वाहनों और राहगीरों से गुलजार रहने वाला ऐतिहासिक हावड़ा पुल वीरानी की गाथा कहने लगा है। रेल शब्द सुनते ही मानस में उभरने वाले नाम हावड़ा और सियालदह जैसे रेलवे स्टेशन यत्रियों के लिए तरस रहे हैं। राज्य में रेल, बस, टैक्सी, टेम्पो आदि आवागमन सेवाएं बंद हैं, व्यापार ठप हैं। जूट मिलों की चिमनियां भी धुआं नहीं उगल रही। गली-मोहल्लों में पुलिस वाहन से माइक गूंज रहे हैं मानो ब्लैक-आउट का ऐलान हो रहा हो, युद्धकाल आ गया हो।
चाय बागानों में पत्तियां तोडऩे का सिलसिला थम गया है। बड़ी संख्या में श्रमिक गांव लौट गए हैं। गरीब तबका भोजन के लिए तरसने लगा है। समाज सेवी संस्थाएं, ट्रस्ट, कंपनियां और सेवाभावी लोग मदद कर रहे हैं। लोग घरों में कसमसा रहे हैं, मानो कसा हुआ कुर्ता पहन लिया हो, मगर बाध्य हैं। दुकानों पर आवश्यक सामग्री की भी किल्लत है। ऑन लाइन बुकिंग रद्द हो रही हंै। कई सरकारी और निजी संस्थानों के कर्मचारी घर से ही कार्य कर सहयोग कर रहे हैं। लॉक डाउन का दूसरा राउंड चल रहा है , आमजन में घबराहट है। इंतजार है...कब लॉक डाउन का लॉक खुले और यह ऐतिहासिक शहर फिर गुलजार हो।