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डकैतों की आराध्य थी इसलिए नाम पड़ गया डकैत काली

डकैतों की आराध्य थी इसलिए नाम पड़ गया डकैत काली राज्य के कुख्यात डकैतों में एक रघु ने बनवाया था मंदिर

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डकैतों की आराध्य थी इसलिए नाम पड़ गया डकैत काली

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हुगली
हुगली जिले के मगरा के त्रिवेणी के मगरा रोड स्थित डकैत काली मंदिर प्राचीन व चर्चित धार्मिक स्थल है। श्रुतियों के मुताबिक पहले इस मंदिर में नरबलि दी जाती थी। जो यहां हुई एक घटना के बाद बंद हो गई। अब मंदिर में छाग, ईख, और कुम्हड़े की बली दी जाती है। मां काली उक्त मंदिर में रूद्र रुप में विराजमान हैं। जिसकी आठ भुजाएं है। उनके हाथ ों कटार की जगह तलवार है। मां के बांए पैर शिव के सीने पर है उन्हें वामाकाली व दक्षिणाकाली रूप में भी पूजा जाता है।

मंदिर के पुरोहित सुमन चक्रवर्ती ने बताया कि मंदिर करीब पांच सौ साल पुराना है। विधूभूषण घोष व रघु नाम के दो डकैतों ने इस मंदिर की स्थापना की थी। स्थापना के समय मंदिर घने जंगलों के बीच स्थित था। मंदिर के पास ही डकैतों का अड्डा था। उस समय उनके अड्डे के पास आने वालों की डकैत बलि दे देते थे। बताया जाता है कि साधक राम प्रसाद सेन एक बार इस जंगल से गुजर रहे थे, उन्हें डकैतों ने पकड़ लिया और बलि चढ़ाने के लिए बांध दिया और उनकी अंतिम इच्छा पूछी। राम प्रसाद ने कहा कि मैं मां के गीत गाना चाहता हूं। उनके गीत गाते ही डकैतों को मां काली ने दर्शन दिए और साधक को छोडऩे का आदेश दिया। डकैतों ने राम प्रसाद सेन को उनके घर पहुंचा दिया। उसके बाद से ही नरबली की प्रथा बंद कर दी गई।

राज्य के सात कुख्यात डकैतों में एक था रघु

मगरा बस स्टैण्ड के समीप स्थित मंदिर जिसे रघु डकैतकाली मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। बताया जाता है कि रघु राज्य के कुख्यात सात डकैतों में एक था। उसने तारकेश्वर, नवदीप सहित कई जगहों पर मां काली के मंदिर बनवाए थे। वह मां काली का परम भक्त था। वह अपने दल बल के साथ लूट पाट करने के पहले और बाद में मशाल की रौशनी में मां की पूजा अर्चना करते थे।