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Darjeeling Tea: जलवायु परिवर्तन से दार्जिलिंग चाय उद्योग संकट में, दो दशकों में तापमान 0.51 डिग्री सेल्सियस बढ़ा

दार्जिलिंग की विश्वप्रसिद्ध चाय (Darjeeling Tea) जलवायु परिवर्तन के कारण अपना जायका खोती जा रही है और लाखों लोगों की जीविका से जुड़े उद्योग का जोखिम भी बढ़ गया है।

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Darjeeling Tea: जलवायु परिवर्तन से दार्जिलिंग चाय उद्योग संकट में, दो दशकों में तापमान 0.51 डिग्री सेल्सियस बढ़ा

Darjeeling Tea: जलवायु परिवर्तन से दार्जिलिंग चाय उद्योग संकट में, दो दशकों में तापमान 0.51 डिग्री सेल्सियस बढ़ा


कोलकाता.
दार्जिलिंग की विश्वप्रसिद्ध चाय जलवायु परिवर्तन के कारण अपना जायका खोती जा रही है और लाखों लोगों की जीविका से जुड़े उद्योग का जोखिम भी बढ़ गया है। दार्जिलिंग की चाय का अनोखे स्वाद में हिमालयीन वातावरण, धूप, बारिश, धुंध और मिट्टी की अम्लता ही उसके स्वाद के सही संतुलन का कारण माना जाता है। हाथ से चाय बागान में पत्तियां तोड़ी जाती हैं। यही कारण है विश्व भर में भारतीय शैम्पेन का दर्जा पाई दार्जिलिंग चाय एक सदी से भी अधिक समय से दुनिया भर के उपभोक्ताओं के बीच पसंदीदा बनी हुई है। टी बोर्ड ऑफ इंडिया की वेबसाइट में जिक्र किया गया है कि दार्जिलिंग चाय दुनिया में कहीं और उगाई या निर्मित नहीं की जा सकती है। दार्जिलिंग चाय अपने चमकीले धात्विक रंग के साथ वर्ष 2004 में भौगोलिक संकेत (जीआई) ट्रेडमार्क से सम्मानित होने वाला देश का पहला उत्पाद था। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी योग्यताओं के बावजूद दार्जिलिंग की चाय का उत्पादन, घरेलू व अंतरराष्ट्रीय मांग भी गिर रही है।
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जलवायु परिवर्तन संकट
दार्जिलिंग चाय अनुसंधान और विकास केंद्र के शोधकर्ताओं के वर्ष 2013 के एक अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण दार्जिलिंग चाय उत्पादन वर्ष 1993 और 2002 की तुलना में औसतन ४1.97 फफीसदी और 30.90 प्रतिशत कम हुआ। अध्ययन में यह भी कहा गया कि विभिन्न कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में उगाई जाने वाली चाय वर्षा-आधारित फसल है। जो पर्यावरणीय कारकों से प्रमुख रूप से प्रभावित होती है। इसके उत्पादन पर वार्षिक वर्षा और उसका वितरण, तापमान और सौर विकिरण बढ़ा प्रभाव डालते हैं। अध्ययन में पाया गया कि क्षेत्र का तापमान वर्ष 1993 से वर्ष 2012 तक 0.51 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। वार्षिक वर्षा में 152.50 सेमी और सापेक्ष आद्र्रता में 16.07 फीसदी की गिरावट आई है। इन्हीं वजहों से चाय के कुल उत्पादन में गिरावट आई है।
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इनका कहना है
नीचे जा रहा भू जल स्तर
दार्जिलिंग-इंडियन टी एसोसिएशन (डीआईटीए) के प्रधान सलाहकार संदीप मुखर्जी ने कहा पहाड़, डुआर्स व तलहटी इलाकों का भूजल स्तर नीचे चला गया है। अब चाय का मौसम सूखे से शुरू होता है।
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सूखे, बेमौसम बारिश से असर
भारतीय चाय निर्यातक संघ (आईटीईए) के अध्यक्ष अंशुमन कनोरिया के मुताबिक हर साल सर्दियों में बारिश की कमी होती है। इससे पहली फ्लश का उत्पादन प्रभावित होता है। इसके बाद अप्रेल मई, जून मे बेमौसम बारिश से दूसरे फ्लश की गुणवत्ता प्रभापित होती है।
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क्या है दार्जिलिंग चाय का इतिहास
कैमिलिया साइनेंसिस नामक पौधे की पत्तियां दुनिया में दार्जिलिंग चाय के रूप में जानी जाती हैं। जिसे पहली बार सन 1841 में ईस्ट इंडिया कंपनी के आर्थर कैंपबेल दार्जिलिंग लाये थे। सान १874 तक दार्जिलिंग की पहाडिय़ों, डुआर्स और तराई क्षेत्र में 113 चाय बागान बन गए। विख्यात लेखक बसंत बी लामा ने अपनी वर्ष 2008 की किताब, 'द स्टोरी ऑफ दार्जिलिंग' में सन 1915 से बंगाल सरकार के आंकड़ों का हवाला देते हुए लिखा है कि सन 1914 तक दार्जिलिंग में चाय उत्पादन की मात्रा 8.16 मिलियन किलोग्राम थी। वर्तमान में चाय बागानों की संख्या बढक़र 156 हो गई है। मौजूदा उत्पादन लगभग 10 मिलियन किलोग्राम है।
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बाहर से लाए गए ४० हजार मजदूर
बढ़ते चाय व्यापार के श्रमिकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए इस उद्योग में बड़े पैमाने पर डुआर्स तराई क्षेत्र पड़ोसी नेपाल और छोटा नागपुर पठार से श्रमिक लाए गए। १९वीं सदी की शुरुआत में यह जनसंख्या ४० हजार तक थी जो अब बढक़र एक लाख तक जा पहुंची है।