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‘म्हारी भी सुन लो अरजी बाबा….’

लोकदेवता बाबा रामदेव का दशमी महोत्सव, रामसा पीर मंडल के आयोजन में झलकी राजस्थानी संस्कृति, 108 थाल से संध्या महाआरती, भजनों पर थिरके श्रद्धालु

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‘म्हारी भी सुन लो अरजी बाबा....’

कोलकाता. आओ बाबा, पधारो बाबा, म्हारी भी सुन लो अरजी बाबा....सहित कई मधुर भजनों के साथ राजस्थान के लोक देवता और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक बाबा रामदेव का दशमी महोत्सव बुधवार को धूमधाम से बॉलीगंज पार्क स्थित राजेश गणपति बैंक्वेट में मनाया गया। महानगर में निवासरत प्रवासी राजस्थानियों ने बड़ी संख्या में परिवार सहित इसमें भाग लिया, जिसमें काफी संख्या में महिलाएं थीं। राजस्थानी वेशभूषा में सुसज्जित श्रद्धालुओं और कलाकारों की ओर से पेश राजस्थानी भजनों ने महानगर में राजस्थानी संस्कृति की झलक पेश कर दी। रामसा पीर मंडल की ओर से आयोजित महोत्सव में सुबह पूजा-अर्चना के बाद आरती हुई। कथावाचक लक्ष्मीकांत व्यास मुन्ना ने व्यास पीठ से रामसा पीर का जुम्मा (अमृत कथा) का वाचन किया। दोपहर १.३० बजे से बाबा के चरणों का अभिषेक हुआ और 108 थाल से संध्या महाआरती हुई। संगीतमय भजनों की अमृतवर्षा में रात तक श्रद्धालु भाव विभोर हो भक्ति भाव से झूमते रहे। चेयरमैन तिलोकचंद डागा, अध्यक्ष प्रह्लाद राय गोयनका, सचिव जुगल राठी की उपस्थिति में पूजन शंकरलाल अग्रवाल परिवार ने किया। गिन्नी कौर, श्याम अग्रवाल, रवि बेरीवाल और नवीन आचार्य आदि कलाकारों ने एक से बढक़र एक आकर्षक भजन प्रस्तुत कर समां बांध दिया।
----इनका रहा योगदान
महोत्सव को सफल बनाने में संरक्षक प्रदीप कुमार तोदी, ओम जालान, अरूण मोहता, बनवारीलाल सोती, गजानंद मुनका, राजेंद्र कुमार सेठिया, संजय मानसिंहका, बजरंगलाल बामलवा, राजेश अग्रवाल, हरिकिशन राठी, जयप्रकाश सिंह, स्वागत समिति के रामप्रताप अग्रवाल, गोपाल छापडिय़ा, मोहनलाल वर्मा, श्रीगोपाल मल्ल, नरेश थरड़, देवकिशन मूंधड़ा और प्रकाश डागा आदि का योगदान रहा।
---हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक बाबा रामदेव पीर
15वीं शताब्दी के आरम्भ में भारत में लूट-खसोट, छुआछूत, हिंदू-मुस्लिम झगड़ों आदि के कारण स्थितियां बड़ी अराजक बनी हुई थीं और भैरव नामक राक्षस का आतंक था। ऐसे विकट समय में पश्चिम राजस्थान के पोकरण नगर के पास रुणिचा नामक स्थान में तंवर वंशीय राजपूत और रुणिचा के शासक अजमाल के घर भादो शुक्ल पक्ष दूज के दिन विक्रम सम्वत् 1409 को बाबा रामदेव पीर अवतरित हुए, जिन्होंने लोक में व्याप्त अत्याचार, वैर-द्वेष, छुआछूत का विरोध कर अछूतोद्धार का सफल आन्दोलन चलाया। हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक बाबा रामदेव ने अपने अल्प जीवन के 33 वर्षों में वह कार्य कर दिखाया जो सैकड़ों वर्षों में भी होना सम्भव नहीं था। सभी प्रकार के भेद-भाव मिटाने एवं सभी वर्गों में एकता स्थापित करने की पुनीत प्रेरणा के कारण बाबा रामदेव जहां हिन्दुओ के देव हैं तो मुस्लिम भाईयों के लिए रामसा पीर। मुस्लिम भक्त बाबा को रामसा पीर कह कर पुकारते हैं। राजस्थान के जनमानस में 5 पीरों की प्रतिष्ठा है जिनमे बाबा रामसा पीर का विशेष स्थान है। बाबा रामदेव ने छुआछूत के खिलाफ कार्य कर सिर्फ़ दलितों का पक्ष ही नहीं लिया वरन उन्होंने दलित समाज की सेवा भी की। डाली बाई नामक एक दलित कन्या का उन्होंने अपने घर बहन-बेटी की तरह रख कर पालन-पोषण किया। यही कारण है आज बाबा के भक्तों में एक बहुत बड़ी संख्या दलित भक्तों की है। बाबा रामदेव पोकरण के शासक भी रहे, लेकिन उन्होंने राजा बनकर नहीं, बल्कि जनसेवक बनकर गरीबों, दलितों, असाध्य रोगग्रस्त रोगियों व जरुरतमंदों की सेवा की। उन्होंने पोकरण की जनता को भैरव राक्षक के आतंक से भी मुक्त कराया। प्रसिद्ध इतिहासकार मुंहता नैनसी ने अपने ग्रन्थ मारवाड़ रा परगना री विगत में इस घटना का जिक्र किया है। जन-जन की सेवा के साथ सभी को एकता का पाठ पढाते बाबा रामदेव ने भाद्रपद शुक्ला एकादशी वि.स . 1442 को जीवित समाधी ले ली। बाबा रामदेव के भक्त दूर-दूर से रुणिचा उनके दर्शनार्थ और अराधना करने आते है। हर साल लगने मेले में लाखों की तादात में जुटी उनके भक्तों की भीड़ से उनकी महत्ता व उनके प्रति जन समुदाय की श्रद्धा का आकलन आसानी से किया जा सकता है।