13 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

पहला जासूसी किरदार भी दिया बंगाल ने

जासूसी चरित्र व्योमकेश बक्शी ने छोटे बड़े पर्दे पर मचाई है धूम

2 min read
Google source verification
kolkata

पहला जासूसी किरदार भी दिया बंगाल ने


कोलकाता. बंगाल के साहित्यकारों की कृतियों पर आधारित फिल्मों ने हमेशा से ही बॉलीवुड को रोमांचित किया है। शरतचंद्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर की परंपरा का ही अनुशरण करते हुए शरदेन्दु मुखर्जी के जासूसी चरित्र व्योमकेश बक्शी को छोटे और बड़े पर्दे पर उतारा गया। शरदेन्दु के रचना संसार की पैदाइश इस चरित्र का जन्म 1930 के दशक में हुआ। कुल जमा 33 रचनाओं में अलग अलग गुत्थियों को सुलझाते हुए व्योमकेश 1960 के दशक में थम गए। खुद को सत्यानवेशी कहने वाले इस चरित्र को पाठकों ने विदेशी जासूस शर्लाक होम्स का बांग्ला संस्करण भी बताने की कोशिश की। लेकिन बांग्ला संस्कृति और भद्र लोक के बीच से तैयार हुए इस चरित्र ने मुख्य रूप से जासूसी की भारतीय परंपरा का श्री गणेश किया।

धोती ,कुर्ता, शॉल ओढ़े व्योमकेश छोटे बड़े अपराधों के पीछे का सत्य उजागर करते रहे। विज्ञान, पुस्तकें, पुराने अखबार, रूप परिवर्तन के सहारो और सबसे बढक़र अपराधियों का मनोविज्ञान समझने की ब्योमकेश की ताकत आपराधिक गुत्थियों को समझने में मददगार बनती रही। 1990 के दशक में राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन पर शरदेन्दु मुखर्जी की सभी 33 रचनाओं पर आधारित धारावाहिक का प्रसारण हुआ। रातों रात बंगाल के इस जासूस ने छोटे पर्दे के दर्शकों को सम्मोहित कर लिया। कड़ी दर कड़ी व्योमकेश सुलझता गया, उसके निजी जीवन भी आगे बढ़ता गया। नहीं छूटा तो उसका धोती, कुर्ता। दर्शकों ने सीरियल को हाथों हाथ लिया। सीरियल की लोकप्रियता का आलम यह रहा कि एक बार प्रसारण पूरा होने के बाद समय समय पर फिर से दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों पर उसका प्रसारण किया जाता रहा। जो आज भी जारी है। पूरी तरह से बंगाल और कोलकाता में शूट किए गए सीरियल में शहर की पहचान से जुड़े हर उस लैंडमार्क लोकेशन को जगह दी गई जिसका जिक्र शरदेन्दु की रचनाओं में मिला।

यही वजह है कि जासूसी चरित्र की लोकप्रियता से प्रभावित होकर वर्ष 2015 में दिबाकर बनर्जी निर्देशित ब्योमकेश बॉलीवुड में रिलीज की गई। 1940 के कोलकाता और शहर में व्याप्त अपराध जगत की पृष्ठभूमि पर तैयार फिल्म को दर्शकों ने खासा सराहा। पुरानी ट्रामें, विक्टोरिया कालीन सरंचनाएं, हावड़ा ब्रिज, गंगा तट पर मौजूद जेटियों ने फिल्म में एक बार फिर औपनिवेशिक कोलकाता को दर्शकों के सामने रखा। सुशांत सिंह राजपूत धोती, कुर्ता पहने कोलकाता की गलियों में सत्यान्वेषण करते दिखे। दशकों पहले साहित्यिक रचना के इस मृदु भाषी जासूस ने बड़े पर्दे पर भी दर्शकों को बांधे रखा। बॉलीवुड के अलावा टॉलीवुड में भी ब्योमकेश का प्रेम बना हुआ है। वर्ष 2010 के बाद हर साल इस डिटेक्टिव से जुड़ी कोई न कोई फिल्म जरूर रिलीज हो रही है। दरअसल भारतीय सिनेमा के नायक को सत्य के लिए लड़ाई करते दिखाए जाने की पुरानी परंपरा आज भी कायम है। परंपरा के इसी फ्रेम में सत्यान्वेशी ब्योमकेश फिट बैठते हैं। कोई अचरज नहीं कि दिबाकर बनर्जी एक बार फिर बड़े पर्दे पर बंगाल के इस जासूस को पेश करें।