
कोलकाता. औपनिवेशक युग और श्रम दासता के प्रतीक मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाला परिवहन माध्यम ‘हाथ रिक्शा’ अपनी तमाम कमियों-खूबियों के बावजूद आज के डिजिटल युग में बॉलीवुड के साथ-साथ ‘सिटी ऑफ ज्वॉय’ का लैंडमार्क बना हुआ है। वैसे तो रिक्शे का आविष्कार जापान में 1860 में ही हो गया था, जिसका 1930 तक परिवहन-यातायात के विभिन्न आधुनिक साधनों के बढ़ते उपयोग के कारण प्रचलन कम होने लगा। इसके विपरित ‘सिटी ऑफ ज्वॉय’ में आज भी ‘हाथ रिक्शे’ की लोकप्रियता बरकरार है। भारत में सबसे पहले शिमला में 1880 में शुरू होने के बाद 1914 में कोलकाता में हाथ रिक्शा अस्तित्व में आया। आज जबकि अनेक प्रमुख शहरों में ‘हाथ रिक्शा’ बंद हो चुका है, वहीं आज भी यह कोलकाता निवासियों की शान की सवारी बना हुआ है। इसकी बढ़ती लोकप्रियता के कारण ही इसे 24 घंटे का एंबुलेंस कहा जाता है। विशेषकर मानसून या बंद के दौरान महानगरवासी इसी हाथ रिक्शे की ओर रूख करते हैं और उस समय इसकी उपयोगिता-लोकप्रियता अधिक बढ़ जाती है। मानसून के दौरान कोलकाता के पुराने हिस्से में पानी से लबालब गलियों और सडक़ों पर जब टैक्सी, कार और ऑटो की सेवाएं दम तोड़ देती हैं, तो इस स्थिति में ‘हाथ रिक्शा’ किसी देवदूत की तरह महानगरवासियों को राहत प्रदान करता है। वर्तमान में महानगर में निवासरत करीब 6 हजार रिक्शा चालकों की जिंदगी सुबह 5 बजे से शुरू होकर देर शाम समाप्त होती है। वे एक से दूसरे स्थान तक सामान वितरित कर बच्चों को स्कूल ले जाने के साथ घर वापस लाते हैं और महिलाओं को आसपास के स्थानीय बाजारों की सैर। फिर दोपहर कुछ पल झपकी लेकर आराम के बाद शाम तक उत्तर-मध्य कोलकाता की सडक़ों और गलियों की खाक छानते हैं।
2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव ने की थी प्रतिबंध की घोषणा
2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने ‘हाथ रिक्शा’ पर प्रतिबंध लगाकर चालकों के पुनर्वास की घोषणा की थी, पर मामला आजतक अधर में है। कोलकाता में इस प्राचीन विरासत का संबंध शिमला से है, जो ब्रिटिश भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी अफसरों की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। 1880 के दशक में ब्रिटिश भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता में परिवहन का यह साधन ब्रिटिश महिलाओं की पसंदीदा सवारी थी। आजादी के बाद रिक्शे ने रिक्शे को खींचा और अंग्रेजों ने अपने अधिकार का इस्तेमाल गरीब भारतीयों पर अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए कलकत्ता में इसे पेश किया। बंगाल के पड़ोसी राज्यों बिहार और उड़ीसा के निर्धन अप्रवासियों के लिए यह रोजगार का साधन बन गया। विदेशी पर्यटकों की नजर में कोलकाता की प्रमुख 3 पहचान विक्टोरिया मेमोरियल व हावड़ा ब्रिज में ‘हाथ रिक्शा’ भी शामिल है।
खून जला और पसीना बहाकर खींचते हैं हाथ रिक्शा
दशकों से हाथ हिक्शा की कमान संभाल रहे बिहार के अनेक रिक्शा चालक खून जला और पसीना बहाकर पापी पेट की खातिर हाथ रिक्शा खींचते हैं, पर किसी के आगे हाथ नहीं पसारते। पिछले 50 साल से रिक्शा चलाकर खुद का पेट भरने के साथ परिजनों की परवरिश कर रहे बिहार के नवादा जिले के निवासी राम यादव आज 80 साल की आयु में भी खुदगर्ज की मिसाल पेश कर रहे हैं। कोलकाता की गलियों में हाथ रिक्शा चलाने वाले यादव ने कहा कि अगर इसके बदले सरकार की ओर से कोई दूसरे विकल्प की व्यवस्था की जाए, त ो उन्हें काफी खुशी मिलेगी। इसी तरह गया निवासी नारद महतो, दरभंगा के लोरिका पासवान (68), झारखंड के गिरिडीह निवासी मोहन गोसाईं और गया निवासी 26 साल के युवा पिंटू यादव ने भी हाथ रिक्शा को मजबूरी में चलाने वाला पेशा बताकर अपनी परेशानी-पीड़ा बताई।
बॉलीवुड ने बनाया नायक
कई साहित्यिक पुस्तकों में कोलकाता के इस रिक्शे का जिक्र है और विभिन्न भाषाओं की फिल्मों में प्रदर्शित किया गया है। कंक्रीट की सडक़ों पर बिछी लोहे कीपटरियों और भीड़ भरी तंग गलियों में हाथ रिक्शे का हैंडल पकड़े उसके चालक की जुगलबंदी से बॉलीवुड ने हर दौर में प्यार किया है। मशहूर ब्रिटिश लेखक/उपन्यासकार रूडयार्ड किपलिंग ने ‘द फैंटम रिक्शा’ व अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफर ग्रेग वोर ने अपने फोटो संग्रह में भी इसे मुख्य स्थान दिया है। 1952 में बलराज साहनी अभिनीत फिल्म दो बीघा जमीन के साथ त्रिमांशु धूलिया की फिल्म बुलेट राजा में हाथ रिक्शे का बखूबी चित्रांकन किया गया था। 1992 में फिल्म ‘सिटी ऑफ ज्वॉय’ में ओम पुरी ने एक रिक्शा खींचने की भूमिका निभाकर रिक्शा चालकों की आर्थिक-भावनात्मक कठिनाई को पेश किया था।
Published on:
20 Apr 2018 10:48 pm
बड़ी खबरें
View Allकोलकाता
पश्चिम बंगाल
ट्रेंडिंग
