
भारत में कम्युनिष्ट आंदोलन का सफल चेहरा जिसने ठुकराया था प्रधानमंत्री का पद
जन्म आठ जुलाई 1914 मृत्यु 17 जनवरी 2010
कोलकाता.
पश्चिम बंगाल में सात दशकों तक कम्युनिष्ट आंदोलन का चेहरा रहे और देश में सर्वाधिक समय तक मुख्यमंत्री बने रहने का रिकार्ड बनाने वाले ज्योति बसु के साथ इतिहास की कुछ ऐसी यादें जुड़ी हुई हैं जो उन्हें भारतीय राजनीति में बिरले व्यक्तित्व का धनी बनाती हैं। नरसिंह राव नीत केन्द्र सरकार के अंतिम समय में जब कुछ लोग यह कहने लगे थे कि 1996 के संसदीय चुनाव के बाद ज्योति बसु देश के प्रधानमंत्री बन जाएंगे। उनका ऐसा मानना इस तर्क पर आधारित था कि उस दौरान क्षेत्रीय क्षत्रप तेजी से केन्द्रीय राजनीति में लोकप्रिय हो रहे थे। जिनमें से कुछ लेफ्ट के साथ आने को तैयार थे। इसके साथ ही बसु के पास लंबा प्रशासकीय अनुभव भी उन्हें दूसरों से दौड़ में आगे कर रहा था। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद माकपा की अंदरूनी खींचतान के कारण ज्योति बसु पहली पसंद होने के बावजूद गठबंधन के मुखिया नहीं बन पाए। प्रधानमंत्री का पद उनके पास से आता आता चला गया। जिसे बाद में स्वयं बसु ने ऐतिहासिक भूल करार दिया।
ज्योति बसु महत्वपूर्ण पड़ाव
-आठ जुलाई 1914 को कोलकाता में जन्मे बसु की स्कूली शिक्षा कोलकाता में हुई। उनके पिता निशिकांत बसु और मां हेमलता देवी कोलकाता में रहते थे। उनके पूर्वजों का घर ढाका में बारदी गांव में था। उनके पिता नशिकांत बसु एक प्रतिष्ठित होम्योपैथ डॉक्टर थे। सेंट जेवियर्स स्कूल से इंटरमीडिएट करने के बाद अंग्रेजी में ऑनर्स के लिए प्रेसीडेंसी कॉलेज में एडमीशन लिया था। बसु स्कूल में रहते हुए, 1930 में सूर्य सेन के नेतृत्व में चटगांव के सशस्त्र विद्रोह से प्रेरित थे।
सन 193५ कानून की पढ़ाई करने इंग्लैंड गए। जहां भारतीयों के संगठन लंदन मजलिस के पहले सचिव बने। 1940 में भारत लौटे, कम्युनिष्ट आंदोलन से पूरी तरह जुड़ गए। बसु कोलकाता में सोवियत संघ के मित्र और एंटी-फासिस्ट राइटर्स एसोसिएशन के सचिव बने। 1944 से ट्रेड यूनियन फ्रंट में उनकी पारी शुरू हुई। ज्योति बाबू 1946 में रेलवे श्रमिक निर्वाचन क्षेत्र से बंगाल प्रांतीय असेंबली के लिए निर्वाचित हुए। सन1952 में बरानगर से विधानसभा के लिए चुने गए थे। जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुडक़र नहीं देखा। सन1957, 1962, 1967, 1969, 1971, 1977, 1982, 1987, 1991 और 1996 में विधानसभा के सदस्य रहे। 1957 से 1967 तक विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे। 1967 में बनी वाम मोर्चे के प्रभुत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार में ज्योति बसु को गृहमंत्री बनाया गया लेकिन नक्सलवादी आंदोलन के चलते राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया और वह सरकार गिर गई। 21 जून 1977 को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने। स्वास्थ्य कारणों से छह नवंबर 2000 को मुख्यमंत्री पद छोड़ा। उन्होंने लगातार 23 साल तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में काम कर राष्ट्रीय रिकार्ड बनाया।
भूमि सुधार और अस्थिरता खत्म की
बसु के नेतृत्व में बंगाल सरकार ने नक्सलबाड़ी आंदोलन से राज्य में पैदा हुई अस्थिरता को खत्म किया। राजनीतिक स्थाइत्व की स्थापना की। बसु ने मुख्यमंत्री रहते हुए भूमि सुधार किया। राज्य सरकार ने जमींदारों और सरकारी कब्ज़े वाली ज़मीनों का मालिकाना करीब 10 लाख भूमिहीन किसानों को दे दिया। हां यह बात और है कि बसु सरकार बार-बार हड़ताल करने वाली ट्रेड यूनियनों पर कोई लगाम नहीं लगा पाई, उद्योगों की स्थापना में पिछड़ी और विदेशी निवेश नहीं आकर्षित कर पाई।
Published on:
08 Jul 2018 11:03 pm
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