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KARGIL MARTYR KANAD _ :कारगिल में कनाद ने की थी नाकाम ना-पाक कोशिश

KANAD SACRIFICED HIS LIFE FOR NATION,. But Bengal cries for his scarifies.:घायल होने के बावजूद शहीद लेफ्टिनेंट कनाद भट्टाचार्य ने दिया था कई घंटों तक मुंहतोड़ जवाब---कारगिल विजय दिवस पर पत्रिका खास,-मरणोपरांत सेना मेडल से सम्मानित, कोलकाता के जांबाज ने महज 22 साल की आयु में दे दिया देश के लिए बलिदान, टाइगर हिल पर संभाला था खुद मोर्चा, बर्फ में दफन मिला था शरीर

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KARGIL MARTYR KANAD _ :कारगिल में कनाद ने की थी नाकाम ना-पाक कोशिश

कोलकाता (शिशिर शरण राही). ‘शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।’ मई और जुलाई 1999 के बीच कश्मीर के कारगिल में पाकिस्तानी सेना और कश्मीरी उग्रवादियों की ओर से एलओसी पार कर हिन्दुस्तान की जमीं पर कब्जा करने की ना-पाक कोशिश नाकाम करने वाले कोलकाता के पहले शहीद लेफ्टिनेंट कनाद भट्टाचार्य की शहादत पर यह पंक्ति चरितार्थ साबित होती है। कोलकाता के बीटी रोड पर बनहुगली के समीप बारानगर निवासी महज 22 साल की आयु में ही लेफ्टिनेंट कनाद ने घायल होने के बावजूद कई घंटों तक मुंहतोड़ जवाब दिया और अंतिम सांस तक दुश्मनों से लोहा लेते हुए अदम्य वीरता और साहस का परिचय दिया था। टाइगर हिल पर जोश, जज्बा और जुनून का परिचय देकर देश के लिए जान न्यौछावर करने वाले इस जांबाज को तब भारत सरकार ने मरणोपरांत सेना मेडल से सम्मानित किया था। 8वीं सिख रेजिमेंट के तहत सेवाएं दे चुके एसएस-३७८१८एम के लेफ्टिनेंट कनाद ने टाइगर हिल पर भारतीय सैन्य कार्रवाई का नेतृत्व किया था। लेह-बाटलिक रोड पर बातनिक के समीप भारतीय वायुसेना ने 04 जुलाई, 1999 को ‘ऑपरेशन विजय’ के जरिए हवाई हमलों की शुरूआत की जबकि इससे पहले ही कानद के नेतृत्व में 8 अन्य रैंक की गश्ती सैन्य टुकड़ी को टाइगर हिल के पास उत्तर-पूर्वी रेंज पर मोर्चा स्थापित करने का जिम्मा सौंपा गया। चारों ओर बर्फ से ढके इस इलाके तक पहुंचने के दौरान कनाद और पाकिस्तानी घुसपैठियों के बीच भीषण गोलाबारी हुई। सिपाही मेजर सिंह के साथ दुश्मनों की नापाक कोशिश नाकाम करते हुए आगे बढऩे के दौरान कनाद की नजर ऑटोमैटिक राइफलों व गोला-बारूद से लैस पाक घुसपैठियों पर पड़ी। इसके बाद कनाद ने फौरन मोर्चा लेते हुए गश्ती टुकड़ी को 2 भागों में बांटकर सतर्क किया और खुद मोर्चा संभाल लिया। साथी सैनिकों की संख्या कम होने के बावजूद अदम्य बहादुरी और दिलेरी का परिचय देते हुए घायल होने पर भी कई घंटों तक दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया। बुरी तरह जख्मी होने के बावजूद कनाद ने अंतिम सांस लेने तक दुश्मनों को टाइगर हिल पर आगे नहीं बढऩे दिया।
--21मई, 1999 को घोषित कर दिया गया लापता

बाद में जब मदद के लिए अतिरिक्त टुकड़ी मौके पर पहुंची, तो कनाद का कोई सुराग नहीं मिला और आखिरकार 21मई, 1999 को उन्हें लापता घोषित कर दिया गया। 15 जुलाई, 1999 को टाइगर हिल पर जब भारतीय जवानों ने कब्जे के बाद कनाद को बर्फ में दफन पाया। तब पार्थिव शरीर कोलकाता स्थित सेना की पूर्वी कमान मुख्यालय फोर्ट विलियम के पूर्वी कमान स्टेडियम लाया गया। सेना, पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों, विभिन्न दलों के नेताओं और काफी तादाद में महानगर वासियों ने इस जांबाज को अंतिम सलामी दी।
-- 2 बहनों का था लाडला

पिता कमलकांत भट्टाचार्य के निधन के बाद उनकी मां पूर्णिमा बेटी/दामाद के ही पास दिल्ली में रहती है। कनाद 2 बहनों पूरबा और जाबा भट्टाचार्य के चहेते थे। आज भी उनकी शहादत को याद कर बीटी रोड स्थित श्री टावर के निवासयिों का सीना गर्व से चौड़ा हो उठता है। पत्रिका संवाददाता ने जब यहां के लोगों से कनाद के बारे में पूछताछ की तो युवाओं सहित अन्य ने कहा कि कनाद जांबाज और नेकदिल इंसान था। उसकी बहादुरी पर उन्हें फख्र है। कोलकाता के एसए जयपुरिया कॉलेज से स्नातक कनाद छात्र जीवन से ही बेहतरीन स्पोर्टसमैन के साथ मार्शल आर्ट-कराटे में ब्लैक बेल्ट थे।