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इस मछली के बिना बंगाल की रसोई अधूरी

पश्चिम बंगाल के लोग इस खाय मछली के दीवाने हैं। अमूमन मानसून में बहुतायत में पाए जाने वाली इस मछली को लोग मछलियों की रानी भी कहते हैं। नाम है हिल्सा बांग्ला में इसे इलिश पुकारा जाता है।

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इस मछली के बिना बंगाल की रसोई अधूरी

कोलकाता. पश्चिम बंगाल के लोग इस खाय मछली के दीवाने हैं। अमूमन मानसून में बहुतायत में पाए जाने वाली इस मछली को लोग मछलियों की रानी भी कहते हैं। नाम है हिल्सा बांग्ला में इसे इलिश पुकारा जाता है। खास बात यह कि इसके बिना बंगाली रसोई को संपूर्ण नहीं माना जाता। अंडे देने के लिए ईलिश मछलियां बंगाल की खाड़ी से धारा के विपरीत तैरती हुई नदियों में आती हैं। खाड़ी से नदी में आने वाले इन मछलियों का स्वाद और उनके व्यंजनों का जायका अलहदा होता है। अमूमन नवंबर से फरवरी माह के बीच लोग ईलिश से परहेज करते हैं। रजत वर्णा ईलिश धूप और पानी के बीच चांदी सी बनी लगती है। कीमतों के बारे में तो पूछिए मत..। खोका ईलिश जो आकार में छोटी होती है लगभग ६ सौ ग्राम वह तीन सौ से 350 रुपए किलो मिलती है। जैसे जैसे वजन बढ़ता है वैसे वैसे कीमत बढ़ती जाती है। तीन किलो की ईलिश की कीमत 12 सौ से 18 सौ रुपए प्रति किलो तक हो जाती है। इस मछली को फ्राई करते समय निकला हुआ तेल बांग्लाभाषियों को खासा लुभाता है। बहुत से लोग उसके तेल और चावल को मिलाकर खाने की शुरुआत करते हैं। इसके अलावा भाप से तैयार होने वाला व्यंजन ईलिश भापा व सरसों के पेस्ट से बनाई गई ईलिश सरसो बाटा भी बेहद लोकप्रिय है। कोई भी पर्व त्योहार चाहे वो पोएला बोइशाख हो, दुर्गापूजा हो या फिर जमाई षष्टी हो, हिल्सा के बगैर पूरे नहीं होते।

हिल्सा मत्सयाखेट की परंपरा का पालन करते हैं मछुआरे

जो मछुआरे हिल्सा पकड़ते हैं उन्हें बांग्ला नववर्ष पोएला बोइशाख के मौके पर पांता हिल्सा खाना होता है। ऐसी मान्यता हैकि अगर उस दिन पांता हिल्सा खाई जाए तो साल भर जेब भरी रहेगी। परंपराओं के मुताबिक हिल्सा पकडऩे वाले मछुआरे अपनी नावों की, मछली पकड़े वाले जालों की भी पूजा करते हैं। जाल निकाल कर उस पर मीठा या बताशा चढ़ाते है। जब पहली बार हिल्सा जाल में आती है तो उसे जाल पर रखा जाता है। इस पर सिंदूर और हल्दी चढ़ाई जाती है फिर मछली के पेटे के हिस्से को काट कर नाव पर रखा जाता है। मछुआरों की पत्नियां सरस्वती पूजा के दिन हिल्सा के जोड़े पर सिंदूर और हल्दी लगाती हैं। बांग्लादेश के कुमिला और नोवाखाली के मछुआरों की स्त्रियां आरती करके हिल्सा का स्वागत करती हैं। बांग्लाभाषियों के जमाईयों के पर्व जमाई षष्ठी के दिन दामाद ससुराल वालों के लिए हिल्सा लेकर आता है। दामाद को बैठाया जाता है और सास उसे थाली में हिल्सा परोसती हैं।