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दादा-दादी की कमी से भावी पीढ़ी को नुकसान

क्या बोलते हैं लोग - वरिष्ठों की कमी का तात्पर्य शिक्षण संस्थान के लुप्त होने जैसा

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दादा-दादी की कमी से भावी पीढ़ी को नुकसान

दादा-दादी की कमी से भावी पीढ़ी को नुकसान


कोलकाता . दादा-दादी, नाना-नानी के साथ का मतलब साक्षात संस्कार व शिक्षण संस्था का उपस्थित होना है। वे बचपन से ही बच्चों को संस्कारित करते हैं, उनमें प्रेम व स्नेह की छांव प्रदान करते थे, जिसमें हर बच्चा खुद को सुरक्षित समझता है। लोग मानते हैं कि मौजूदा दौर में दादा दादी नाना नानी की कमी से बच्चे गुस्सैल, जिद्दी हो रहे हैं, उनमें कुण्ठा जन्म ले रही है।

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जो शिक्षा हमें संयुक्त संस्कार से मिलती रही है वह भूमिका कभी भी एकल परिवार निभा नहीं सकता। दादा-दादी, नाना-नानी की कहानियां शिक्षा प्रदान करने वाली होती थीं। जो संस्कारित करने, शिक्षा देने का काम करती थीं। आज अलग-अलग कमरों में रहने वाले बच्चे इंटरनेट और टीवी से क्या संस्कार सीख रहे हैं। उनका खोना आने वाली पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा नुकसान है। दादा-दादी का न होने के मतलब है कि शिक्षण संस्थान का लुप्त होना है।

विनोद अग्रवाल, श्रीशिक्षायतन स्कूल
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स्नेह की ऐसी छांव जहां पर रहते हुए बच्चा खुद को सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करता था, वह स्नेह की चादर ही हट गई है। जिन्हें दादा-दादी, नाना-नानी का प्रेम मिल रहा है समझ लीजिए कि उससे बड़ा भगवान का आशीर्वाद दूसरा नहीं है। भगवान को हमने नहीं देखा है पर माता-पिता और दादा-दादी का होना साक्षात भगवान है।
सुनील कुमार गुप्ता, बांगुड़ एवेन्यु

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संयुक्त परिवार के खोने से रिश्तों की पहचान धुंधली पड़ गई है। दादी व नानी की सुनाई जाने वाली प्रेरक धार्मिक कथाएं आज के बच्चे नहीं जानते। वे किताबें ढो रहे हैं पर अपने संस्कार से दूर हो रहे हैं। इसका कारण संयुक्त परिवार का खोना है।

प्रकाश किल्ला, उपाध्यक्ष, हावड़ा मारवाड़ी सम्मेलन
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पहले भी अभिभावकों के पास समय नहीं होता था, अभी भी यही हाल है। पहले दादा-दादी बच्चों की देखभाल करते थे। उनके साथ खेलते थे, पढ़ते-पढ़ाते थे, कहानियां सुनाते थे, नियम- संस्कार सिखाते थे, जो अब नहीं हो पाता। लोग एकल परिवार में हैं, बच्चों को नौकर, केयर टेकर बड़ा कर रहे हैं। बच्चों को कहां से संस्कार मिलेंगे। बड़ा होते ही टीवी-मोबाइल- नेट की दुनिया घेर रही है। आज दादा-दादी की कमी बहुत खल रही है।
मंजू लाहोटी, जैन संस्था

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बचपन की सबसे अच्छी यादें उन्हीं से जुड़ी होती हैं। हमने उनसे जो सीखा वही हम आने वाली पीढ़ी को सिखाते हैं। ऐसे ही परम्परा चल रही है। एकल परिवार, संयुक्त परिवार से ठीक उसी तरह से अलग हुए हैं जैसे शाखों से पत्ते। आज बच्चों के अन्दर उपज रही जटिलताओं को दूर करने के लिए फिर से दादा-दादी की जरूरत बढ़ गई है। उनके स्नेह व लाड़-प्यार की भी आवश्यकता बढ़ गई है ।

नीलू गोलच्छा, समाजसेवी
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जो अकेलापन हमें घेरा हुआ है उससे दादा-दादी, नाना-नानी की कमी सामने आती है। रात को बच्चे कहानी सुनाने को कहते हैं तो थके होने के कारण एेसा नहीं कर पाते। ऐसे समय में किसी बड़े का साथ होने की काफी आवश्यकता महसूस होती है। कभी कभी तो एेसा लगता है कि बच्चे बन जाएं ताकि दादा-दादी या नाना-नानी का प्यार फिर से मिल सके।
सुनील सिंह, कोच, मार्शलआर्ट