16 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

मेरी सहेली है कविता: डॉ. रंजना

मन की बातों को शब्दों में साझा करने का माध्यम है कविता, मन के तारों, भावों को व्यक्त का जरिया है कविता, मेरी सहेली है कविता। यह कहना है डॉ. रंजना त्रिपाठी का।

2 min read
Google source verification
मेरी सहेली है कविता:  डॉ. रंजना

मेरी सहेली है कविता: डॉ. रंजना

मन की बातों को शब्दों में साझा करने का माध्यम है कविता
रवीन्द्र राय
कोलकाता. मन की बातों को शब्दों में साझा करने का माध्यम है कविता, मन के तारों, भावों को व्यक्त का जरिया है कविता, मेरी सहेली है कविता। यह कहना है डॉ. रंजना त्रिपाठी का। डॉ. रंजना ने जब से होश संभाला तब से उनको कविताओं से विशेष लगाव है। उन्होंने कई कवियों की कविताएं पढ़ी, फिर खुद कई कविताओं की रचना की। उनकी पहली कविता हासीमारा में एक सुबह है। इसमें पर्वत कंचनजंगा का स्वर्णिम वर्णन है। स्कूल के रास्ते पर अन्य स्वरचित कविता है।
-
कल्पना को उड़ान देती कविता
डॉ. रंजना ने कहा कि हम कविता के जरिए अपनी कल्पना को उड़ान दे सकते हैं। पीड़ा, हर्ष, विषाद इत्यादि को कविताओं के माध्यम से पेश कर सकते हैं। किसी सामाजिक समस्या को मार्मिक तरीके से समाज के सामने ला सकते हैं। समाज को झकझोर सकते हैं।
--
बचपन से पढऩे लिखने का शौक
उत्तर प्रदेश के फैजाबाद की मूल निवासी डॉ. रंजना को बचपन से ही पढऩे लिखने का शौक था। सरस्वती शिशु मंदिर से आरंभिक पढ़ाई के बाद उन्होंने हिन्दी और संस्कृत से डबल एमए किया। फिर बर्दवान यूनिवर्सिटी से हिन्दी में पीएचडी की डिग्री हासिल की। डॉ. रंजना ने केंद्रीय विद्यालय संगठन में बतौर टीचर अपना करियर शुरू किया। वे पिछले साल सेवानिवृत्त हुईं लेकिन स्कूल में पढ़ाना जारी है।
--
स्वरचित कविता
बेटी के जन्म पर लोगों के सूखे चेहरे,
औरों के घरों के सोहर गीत,
लोगों के ताने, मुझे अब पीछे नहीं धकेलते,
क्योंकि मैंने जीना सीख लिया है
मेरी नन्हीं परी की किलकारियां,
उसकी आँखों के सपने, उसके डगमगाते पर सधे कदम,
मुझे ले जाते हैं बादलों के पार, क्योंकि मैंने जीना सीख लिया है।
--
राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित
शैक्षणिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए 2018 में डॉ. रंजना को राष्ट्रीय शिक्षक प्रोत्साहन अवार्ड से सम्मानित किया गया। डॉ. रंजना की डायरी तो कविताओं से भरी है। उनकी कविताओं ने प्रमुख अखबारों और पत्रिकाओं में जगह पाई हैं। केंद्रीय विद्यालय संगठन की पत्रिका काव्य मंजरी में भी उनकी कविता क्योंकि मैंने जीना सीख लिया है, प्रकाशित हुई है।
--
बेटियों को स्वावलम्बन की सीख
डॉ. रंजना ने बेटियों को बड़ी सीख देते हुए कहा कि किसी भी स्त्री का स्वावलम्बी होना बहुत जरूरी है। क्योंकि तब एक स्त्री आर्थिक बंधन से मुक्त हो जाती है। वह अपनी कल्पना को साकार करने की कोशिश करती है।