
RAJASTHANI PRACHARINI SABHA PROGRAMME: ‘जीवन का सार हैं दोहे-छंद जबकि भाषा हमारी संस्कृति और जड़’
कोलकाता . दोहा और छंद जीवन का सार हैं। जबकि भाषा हमारी संस्कृति और जड़ है। जहां तक संभव हो हमें अपनी भाषा में ही बातचीत करने की कोशिश करनी चाहिए। राजस्थानी भाषा के दोहों के प्रचार-प्रसार पर शनिवार को भारतीय भाषा परिषद में हुई गोष्ठी के दौरान विभिन्न वक्ताओं ने यह बात कही। इसका मकसद राजस्थानी भाषा, साहित्य का प्रचार-प्रसार करने के साथ नई पीढ़ी को इससे अवगत कराना था। गोष्ठी में बतौर अतिथि राजस्थान प्रचारिणी सभा के उपाध्यक्ष प्रहलाद राय गोयनका, सचिव महेश लोधा, संयोजक संदीप गर्ग, बालकिशन खेतान, साहित्यकार बंशीधर शर्मा, रोटेरियन गौरीशंकर सारडा, लोक संस्कृति के ट्रस्टी जगदीशचंद्र मूंधड़ा, भाषाप्रेमी शंकरलाल कारीवाल उपस्थित थे। संचालन संदीप गर्ग ने किया। राजस्थान प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष रतन शाह के दिंवगत भाई नंदलाल शाह को श्रद्धासुमन अर्पित करने के बाद गोष्ठी शुरू हुई। अतिथियों ने शाह को याद करते हुए कहा कि राजस्थानी भाषा के प्रचार-प्रसार में नंदलाल के प्रयासों की जितनी तारीफ की जाए कम है। गोयनका ने स्वागत वक्तव्य देते हुए कहा कि अगर हम अपनी भाषा में बातचीत नहीं करेंगे तो हमारी संस्कृति को खत्म होते देर नहीं लगेगी। कोई भी समाज या राष्ट्र तभी उन्नति कर सकता जब वह अपनी मूल संस्कृति-सभ्यता जड़ से जुड़ा रहे। सारडा ने राजस्थानी भाषा को समृद्ध बताते हुए राजस्थान की महत्ता बताई। उन्होंने कहा कि भारत के 100 अमीरों की सूची में 35 राजस्थानी हैं। इसी तरह भारतीय सेना को जितने सैनिक राजस्थान देता है उतना गुजरात-मध्य प्रदेश या अन्य दूसरे राज्य मिलकर भी नहीं दे सकते। पूरे देश के विभिन्न राज्यों में किसानों ने आत्महत्या की, पर राजस्थान में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं। उन्होंने राजस्थान के अतिथि देवो भव परंपरा का बखान कर कहा कि मनुहार शब्द केवल राजस्थानी भाषा में ही है अन्य किसी भी भाषा में इसका जिक्र नहीं।
Published on:
29 Jun 2019 10:18 pm
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