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दुर्लभ गोल्डन लंगूर की प्रजाति संकट में

जंगलों में पैर पसारती आबादी ने वन्यजीवों के लिए खतरा पैदा कर दिया है। वन्यजीवों की कई दुर्लभ प्रजातियों को संंरक्षित नहीं किया गया तो इनका नामो निशान नहीं रहेगा।

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दुर्लभ गोल्डन लंगूर की प्रजाति संकट में

दुर्लभ गोल्डन लंगूर की प्रजाति संकट में

धीरे-धीरे घट रही है संख्या, गिनती के रह गए

कोलकाता. जंगलों में पैर पसारती आबादी ने वन्यजीवों के लिए खतरा पैदा कर दिया है। वन्यजीवों की कई दुर्लभ प्रजातियों को संंरक्षित नहीं किया गया तो इनका नामो निशान नहीं रहेगा।
भारत में लंगूर की दुर्लभ प्रजाति गोल्डन लंगूर भी आबादी के संकट के चलते विलुप्त होने की कगार पर है। गोल्डन लंंगूर धीरे धीरे कम होते जा रहे है। ये प्रजाति असम के मानस नेशनल पार्क सहित अन्य वन क्षेत्रों में अब गिनती की रह गई हैं। वर्ष 2011-12 में असम के जंतुआलय में गोल्डन लंगूर संरक्षण परियोजना की शुरुआत हुई थी। देशभर में असम ही ऐसा राज्य है,जहां के जंतुआलय में गोल्डन लंगूर हैं।
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संरक्षित श्रेणी में
मोटे अनुमान के अनुसार असम के जंगलों में गोल्डन लंगूर की आबादी अब करीब 300-400 ही रह गई है। पड़ोसी देश भूटान के ब्लैक पर्वत की तलहटी में गोल्डन लंगूर पाए जाते हैं। हिमालय क्षेत्र में लोग गोल्डन लंगूर को पवित्र वन्यजीव मानकर पूजा भी करते हैं। भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत गोल्डन लंगूर को संरक्षित वन्यजीवों की श्रेणी में रखा गया है जबकि आईयूसीएन ने इसे संकटापन्न वन्यजीव की श्रेणी में रखा हुआ है।
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मौसम के अनुसार फर
नाम के मुताबिक ही वयस्क गोल्डन लंगूर की चमड़ी सुनहरे रंग की होती है जबकि बाल गहरे पीले रंग के होते हैं। इनकी 20 इंच लंबी पूंछ पेड़ की शाखाओं पर संतुलन बनाने का काम करती है। उनके फर मौसम के अनुसार रंग बदलते हैं। भोजन की तलाश में जंगल से बाहर आते ही लंंगूर या तो बिजली करंट या सड़क हादसों में जान गंवा देते हैं।
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इनका कहना है
असम चिडिय़ाघर में अभी 6 गोल्डन लंगूर हैं जिनमें 3 नर और 3 मादा है। प्रजनन कार्यक्रम के तहत पिछले दो साल में गोल्डन लंगूर के 2 नए मेहमान भी आए।
तेजस मारिस्वामी, आईएफएस अधिकारी, असम