13 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

प्रभु जगन्नाथ के जयघोष से आज गूंजेगा महानगर

रथयात्रा महोत्सव की तैयारियां पूरी, कई जगह मेले का आयोजन

2 min read
Google source verification
kolkata

प्रभु जगन्नाथ के जयघोष से आज गूंजेगा महानगर

कोलकाता. महानगर सहित आसपास के विभिन्न स्थानों में शनिवार को प्रभु जगन्नाथ सहित बलराम और सुभद्रा की रथयात्रा निकाली जाएगी। राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने रथयात्रा महोत्सव पर प्रदेशवासियों को बधाई दी है। इस्कॉन की ओर से जहां 47वीं रथयात्रा निकलेगी, वहीं जगन्नाथ उत्सव समिति के तत्वावधान में जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव अन्तर्गत शनिवार शाम 3.30 बजे साल्टलेक के वृन्दावन धाम स्थित जगन्नाथ मन्दिर (सीबी 54) से चलकर जगन्नाथ बलराम और सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर साल्टलेक की जनता के बीच आएंगे। रथयात्रा महोत्सव को सफल बनाने के लिए जगन्नाथ उत्सव समिति ने साल्टलेक में रथयात्रा मार्ग पर जगह-जगह पूजा-अर्चना व आरती की व्यवस्था की है। उधर जगन्नाथ महाप्रभु निलाद्री बिहारी सेवा समिति की ओर से भी शनिवार से 22 जुलाई तक हाजीनगर स्थित चांदनी घाट में जगन्नाथ की गुण्डिया यात्रा के तहत पूजा-अर्चना और आरती सहित विविध आयोजन होंगे। दुर्गापुर में लगभग एक लाख श्रद्धालु रथयात्रा में शामिल होंगे। दुर्गापुर इस्पात नगरी के बी-जोन स्थित जगन्नाथ मंदिर परिसर से 35 फीट ऊंचे और 15 फीट चौड़े रथ पर सवार होकर प्रभु जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा रवाना होंगे। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ रथ को खींचने का क्रम शुरू होगा। अनेक स्थानों पर मेले का आयोजन होगा, जिसमें खाने-पीने, सजावट, श्रृंगार, घरेलू उपयोग सामग्री की दुकानों के अलावा कई तरह के मनोरंजन के स्टॉल लगेंगे। उधर रथ यात्रा कमेटी जगन्नाथ मंदिर कमेटी, तालपुकुर की ओर से शाम 4 बजे से रथ यात्रा निकाली जाएगी। हावड़ा और हुगली में रथयात्रा की धूम रहेगी।

रथ यात्रा क्यों मनाया जाता है?
रथ यात्रा क्यों मनाया जाता है, इसे प्राय: लोग जानते हैं। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को रथ यात्रा मनाए जाने के पीछे बहुत पुरानी कथा है। शास्त्रों के अनुसार रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से शुरू होती है।
इस महीने रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि यानि 14 जुलाई को मनाया जाएगा। रथ यात्रा मनाए जाने के पीछे सदियों पुराना इतिहास है। कहते हैं कि राजा इन्द्रद्युम्न, जो सपरिवार नीलांचल सागर (उड़ीसा) के पास रहते थे।
उन्हें समुद्र में एक विशालकाय काष्ठ (लकड़ी) दिखा। राजा उस लकड़ी से भगवान की मूर्ति बनाना चाहते थे। रजा के मन में जैसे ही यह विचार आया कि इस सुंदर लकड़ी से जगदीश की मूर्ति बनाई जाए। उन्होंने मूर्ति बनाने के लिए एक शर्त रखी कि मैं जिस घर में मूर्ति बनाऊँगा उसमें मूर्ति के पूरी तरह बन जाने तक कोई न आए। राजा ने इसे मान लिया। आज जिस जगह पर जगन्नाथ का मन्दिर है उसी के पास एक घर के अंदर वे मूर्ति निर्माण में लग गए।