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एसिड अटैक पीडि़त महिलाओं को मलहम

राज्य में एसिड अटैक से पीडि़त महिलाओं को मुआवजे की सीमा बढ़ाकर मलहम लगाने के लिए कानून बदला जाएगा। राज्य सरकार विधानसभा में विधेयक लाकर एसिड अटैक, सामूहिक बलात्कार व महिला अत्याचार से जुड़े अन्य मामलों का मुआवजा बढ़ाएगी। राज्य में महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के मामलों की मुआवजा राशि देश के बाकी हिस्सों की तुलना में कम है

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एसिड अटैक पीडि़त महिलाओं को मलहम

एसिड अटैक पीडि़त महिलाओं को मलहम

कानून बदलकर मुआवजा बढ़ाएंगे

विधानसभा में लाया जाएगा विधेयक

कोलकाता. राज्य में एसिड अटैक से पीडि़त महिलाओं को मुआवजे की सीमा बढ़ाकर मलहम लगाने के लिए कानून बदला जाएगा। राज्य सरकार विधानसभा में विधेयक लाकर एसिड अटैक, सामूहिक बलात्कार व महिला अत्याचार से जुड़े अन्य मामलों का मुआवजा बढ़ाएगी। राज्य में महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के मामलों की मुआवजा राशि देश के बाकी हिस्सों की तुलना में कम है। मुआवजा कम होने की बात स्वीकार करते हुए राज्य सरकार यह भी कह चुकी है कि लीगल सर्विस टू विकटिम्स ऑफ एसिड अटैक( नाल्सा) के मुआवजे संबंधी सिफारिशों को देश के कई राज्यों की सरकारों ने मान लिया है। मुआवजे की बढ़ी हुई रकम से संबंधित सिफारिशें जल्द ही बंगाल में भी स्वीकार की जाएंगी। इसके लिए विधानसभा में कानून बनाया जाएगा।

---तीन लाख है मौजूदा मुआवजा

राज्य में अभी महिलाओं पर एसिड, तेजाब हमले की सूरत में पीडि़ता को तीन लाख रुपये का मुआवजा दिया जाता है। वहीं नाल्सा ने 20 प्रतिशत झुलसने पर तीन लाख रुपये और 50 प्रतिशत से अधिक क्षति होने पर अधिकतम आठ लाख रुपये का भुगतान करने की सिफारिश की है। सिफारिशों के अनुसार बलात्कार, सामूहिक बलात्कार के मामलों में न्यूनतम चार लाख और अधिकतम पांच लाख का मुआवजा देने को कहा है। इन मामलों में भी बंगाल में मुआवजे की राशि तीन लाख रुपए ही है। कई और तरह के महिला संबंधी अपराधों में भी राज्य सरकार की ओर से घोषित मुआवजे की राशि और नाल्सा की सिफारिशों में बड़ा अंतर है। जिन्हें दूर करने के लिए राज्य सरकार कानून की मदद लेगी।--

अदालत में भी है मुआवजे का मामलाराज्य के बहुचर्चित हांसखाली सामूहिक दुष्कर्म मामले में कलकत्ता हाइकोर्ट में एक करोड़ के मुआवजे की अर्जी दी गई है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक ऐसे जघन्य मामलों में मुआवजे का पैमाना कानून नहीं हो सकता, घटना की प्रासंगिकता को देखते हुए मुआवजे का निर्धारण होना चाहिए। हालंाकि अब तक इस संबंध में हाइकोर्ट का आदेश नहीं आया है।