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जैन तेरापंथ के विलक्षण साधक मुनि ताराचंद के संलेखना संथारा की तपस्या प्रवर्धमान

समाधि की ओर बढ़ते कदम

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जैन तेरापंथ के विलक्षण साधक मुनि ताराचंद के संलेखना संथारा की तपस्या प्रवर्धमान

सरदारशहर/कोलकाता. दुनिया में कुछ ही व्यक्तियों का मनोबल और संकल्पबल मजबूत देखा जाता है। जैन तेरापंथ धर्मसंघ के मुनि तारचंद अनेक बलों के पुंज हैं। गत 5 वर्षों से आप सरदारशहर में एकान्त, मौन, ध्यान साधना में लीन हैं।
आचार्य महाश्रमण के मंगल आशीर्वाद से शासन मुनि ताराचंद ने अपने जीवन के 87वें वर्ष को समता वर्ष के रूप मेें निर्धारित किया। इस अवधि में समतावद्र्धक श्लोकों, दस धर्मों, प्रेक्षा-अनुप्रेक्षा के प्रयोगों तथा तप-जप आदि प्रयोगों के द्वारा समता को आत्मसात करने का पूरा प्रयास किया। मुनि का वर्ष 2018 में मुनि दीक्षा का 75वां वर्ष संपन्न हुआ। जीवन यात्रा के इस 88वें वर्ष को मुनि ने संयम वर्ष के रूप में निश्चित कर इस अवधि में संवर एवं निर्जरा के अनेक प्रयोग किए। पांच द्रव्यों से अधिक नहीं खाना, दस पच्चखाण के एकासन, आयंबिल आदि के आठ पंचोले, नौ की तपस्या, एक मास उपवास के एकान्तर, एक मास बेले, एक मास तेले-तेले का तप किया। संयम अभ्यर्थना के हीरक जयंती के अवसर पर काफी वर्षों के पश्चात मुनिश्री सार्वजनिक रूप से परिषद् में पधारे एवं ध्यान मुद्रा में ही विराजमान रहे। 5 फरवरी 2019 को मुनि ने जीवन के 89 वर्ष के प्रारंभ होते ही एक मास के लिए तीन द्रव्यों का संकल्प किया एवं अन्न का वर्जन कर दिया। इस एक मास के प्रयोग में दस दिन बाद काास से संबंधित बीमारी का भयंकर प्रकोप हुआ। उपचार के लिए डॉ. एवं श्रावकों ने बहुत प्रार्थना की लेकिन मुनि ने मना कर दिया एवं अपने आत्मबल के सहारे ही बीमारी का प्रतिरोध किया। इस अवसर पर आचार्य महाश्रमण ने अपने संदेश के मार्फत समझाया कि कुछ - द्रव्यों को बढ़ाकर उपचार कर लिया जाए तो अच्छा रहेगा। 8 मार्च 2019 से 21 मार्च तक मुनि ने दो द्रव्य पानी और छाछ का प्रयोग किया। इन 13 दिनों के प्रयोग में वे बिलकुल स्वस्थ रहे और। मुनि का खाद्य संयम, दृष्टि संयम, अनासक्त भाव, भावशुद्धि जिस प्रकार से वर्धापित हो रहे हैं वे वीतराग पथ को प्रशस्त करने वाले हैं। 22 मार्च 2019 से मुनि ने संलेखना तप शुरू कर दिया है। धर्म परिषद ने उपस्थित संतों के सान्निध्य में उन्होंने 22 से 26 मार्च तक पांच दिन का पच्चखाण किया। संलेखणा की तपस्या को अब16 दिन संपन्न हो रहे हैं। भौतिकवाद के इस युग में मुनि की अप्रमत साधना जैन दर्शन की तपस्या की उतकृष्ठ एवं चरम परम्परा है जिसे संलेखणा कहा जाता है। मुनि का दृढ़ संकल्प है कि चलते-फिरते इस नश्वर शरीर को छोड़ अपने आत्मा का कल्याण करूं। तेरापंथ समाज कोलकाता के समाज सेवी कमल कुमार दुगड़ ने बताया कि मुनि ताराचंद तेरापंथ धर्मसंघ के विलक्षण साधक संत हैं, उनकी तप साधना भविष्य में जैन शासन के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखी जाऐगी, जो जन मानस के लिए प्रेरणा का रुाोत बनेगी।