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जेयू में संलेखना व संथारा पर रखे गए विचार

- विशेषज्ञों ने संबोधित किया सेमिनार

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Kolkata West Bengal

जेयू में संलेखना व संथारा पर रखे गए विचार

कोलकाता

आचार्य महाश्रमण के मंगल आशीर्वाद, नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन व साउथ कलकत्ता श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को जादवपुर विश्वविद्यालय के इंदुमती सभागार में संलेखना व संथारा- समाधि की कला विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया।

नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन की चेयरपर्सन प्रो. सती चटर्जी ने रोचक विषय पर व्याख्यान आयोजित करने पर हर्ष व्यक्त किया। कार्यक्रम का उद्घाटन विशिष्ट अतिथियों ने दीप प्रज्जवलित कर किया। साउथ कोलकाता सभा के प्रधान न्यासी सुरेन्द्र कुमार दुगड़ ने प्रधान वक्ता डॉ. नर्मता कोठारी, विशिष्ट अतिथि मधु दुगड़ व नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन बंगाल के पदाधिकारी व समागत अतिथियों व शिक्षाविदों का अभिनंदन किया।

विशिष्ट अतिथि मधु दुगड़ ने संलेखना व संथारा पर सारगर्भित अभिव्यक्ति दी। उन्होंने कहा कि संलेखना संथारा में व्यक्ति आनन्दपूर्वक, प्रसन्नतापूर्वक समाधि मरण का वरण करता है। उन्होंने अपनी सास-मातृश्री सोहनीदेवी दुगड़ के संथारे का उल्लेख भी किया।
मुख्य वक्ता डॉ. नर्मता कोठारी ने अपने वक्तव्य में संलेखना व संथारा, आत्महत्या व इच्छा मृत्यु पर विस्तृत विचार रखे। उन्होंने पश्चिमी दर्शन शाष्त्र के विद्वानों का इस संबंध में प्रतिपादित अनेक मान्यताओं व सिद्धान्तों को प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि संलेखना में व्यक्ति प्रसन्न मन से अपने कषायों पर विजय प्राप्त करते हुए समाधि पूर्वक जीवन लीला सम्पन्न करता है। वहीं दूसरी तरफ आत्महत्या में व्यक्ति हताश, विराष और दुखी मन से अपने आपको असहाय पाते हुए अपनी जीवन लीला समाप्त करते हैं।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में प्रो. अरूण मुखर्जी, डायरेक्टर, सेंटर फोर कम्परेटिव रिलीजन, एन.सीई बंगाल ने बताया कि सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने भी अपने जीवन के अन्तिम समय में संलेखना व संथारा पूर्वक मृत्यु का समाधिवरण किया था।
कार्यक्रम की शुरुआत साउथ कोलकता महिला मण्डल की बहनों के तुलसी अष्टमक के संगान से हुई। अंत में साउथ सभा के अध्यक्ष विजय चोरडिय़ा ने वक्ताओं व अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर तेरापंथ विकास परिषद के वरिष्ठ सदस्य बुधमल दुगड़, साउथ सभा के निवतर्चमान अध्यक्ष भवरंलाल बैद्य, जय तुलसी फाउंडेशन के महामंत्री सुरेन्द्र बोरड़, समाज की संघीय संस्थाओं के अनेक सदस्य तथा जादवपुर विश्वविद्याल के व्याख्याता एवं दर्शन शास्त्र के शोधार्थी भी उपस्थित थे।