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‘अंग्रेजी सीखना गलत नहीं, पर अपनी भाषा की उपेक्षा संकट’

भारतीय भाषा परिषद में राष्ट्रीय संगोष्ठी, -केंद्रीय हिंदी निदेशालय और भारतीय भाषा परिषद का आयोजन

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kolkata

कोलकाता. भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी का बढ़ता वर्चस्व उसके अस्तित्व पर खतरे की तरह है, जिसका सामना हिंदी सहित सभी भाषाओं को मिल कर करना होगा। भारतीय भाषाओं में वे छोटी-छोटी भाषाएं भी हैं जिनमें देश की विभिन्न जातियों की संस्कृति सुरक्षित हैं। अंग्रेजी सीखना या उससे ज्ञान प्राप्त करना गलत नहीं, पर अपनी भाषा की उपेक्षा और उसमें ज्ञान-विज्ञान का अभाव संकट की तरह देखा जाना चाहिए। केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली और भारतीय भाषा परिषद की ओर से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी के वर्चस्व पर विद्वानों की चर्चा में यह बात उभर कर सामने आई। प्रियंकर पालीवाल ने कहा कि हिंदी भारतीय भाषाओं के लिए एक दुर्ग है। यदि यह टूट गया तो कोई अन्य भारतीय भाषा नहीं बचेगी। प्रो. वेदरमण ने कहा कि हिंदीतर भाषी यदि तमिल या उडिय़ा में अपनी बात रखते हैं और यदि एक भी व्यक्ति समझ नहीं पाता तो यह हमारी कमी है। हर हिंदी भाषी को दक्षिण भारत की कम से कम एक भाषा जरूर सीखनी चाहिए। हिंदी कवि अनुज लुगुन ने कहा कि भाषा और वर्चस्व के संबंध को एक व्यापक आर्थिक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। प्रो. संजय जायसवाल ने कहा कि अंग्रेजी का वर्चस्व सांस्कृतिक साम्राज्यवाद ला रहा है जिसका मुकाबला जमीनी स्तर से करना होगा। सभा की अध्यक्षता कर प्रो. राजश्री शुक्ला ने कहा कि दयानंद सरस्वती ने गुजराती होते हुए भी केशवचंद्र सेन के कहने पर हिंदी में सामाजिक सुधार का प्रचार किया। यदि समाज में कोई वास्तविक परिवर्तन लाना हो तो वह भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही लाया जा सकता है। संचालन करते हुए प्रो विवेक सिंह ने कहा कि हिंदी को बाजार भाषा नहीं, बल्कि इस उदात्त संस्कृति की भाषा समझना चाहिए।
भारतीय भाषाओं की अंतर्दृष्टि पर दूसरे सत्र में चर्चा करते हुए हिंदी कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि अंतर्दृष्टि के निर्माण में लोकजीवन और संस्कृति की एक बड़ी भूमिका है। फिल्मों ने हिंदी का काफी प्रचार-प्रसार किया, पर फिर भी यदि मातृभाषाओं को बचाना है तो सबसे पहले बच्चों को मातृभाषा से प्रेम करना सिखाना होगा। दूसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए बांग्ला कथाकार रामकुमार मुखोपाध्याय ने कहा कि भारतीय भाषा परिषद भारतीय भाषाओं को जोडऩे का एक बड़ा काम कर रही है और सांस्कृतिक संवाद का ऐतिहासिक महत्व है। संगोष्ठी में तमिल लेखक मालन व्ही.नारायणन, हरियाण साहित्य अकादमी की निदेशक कुमद बंसल, ओडिय़ा लेखक रंजन प्रधान, बर्दवान विश्वविद्यालय के शशि कुमार शर्मा और केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो, नई दिल्ली के विनोद संदलेश ने भी अपने विचार व्यक्त किए। संचालन पूजा गुप्ता ने किया। तीसरे सत्र का धन्यवाद परिषद की मंत्री बिमला पोद्दार और समापन सत्र का धन्यवाद ज्ञापन परिषद की अध्यक्ष डा.कुसुम खेमानी ने किया।