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कचरे में खाना खोजते देखा तो भरने लगे बच्चों का पेट

करीब आधी रात का वक्त था...एक बालिका सड़क पर डस्टबिन में वेस्टेज को खंगाल रही थी...सामने एक लड़का हाथ में डंडा लिए खड़ा था...तभी, डस्टबिन में बिरयानी बालिका के हाथ लगी...उसने इसे निकाला...और, खाने लगी...। क्या-क्या गुल खिलाती है भूख। विपन्नों की नियति बयां करता यह शब्द शिल्प किसी फिल्म या कहानी का अंश नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के आसनसोल का वाकया है।

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कचरे में खाना खोजते देखा तो भरने लगे बच्चों का पेट

कचरे में खाना खोजते देखा तो भरने लगे बच्चों का पेट

आसनसोल के एक वाकये ने इंजीनियरिंग कॉलेज के शिक्षक की बदल दी सोच
रवीन्द्र राय
कोलकाता. करीब आधी रात का वक्त था...एक बालिका सड़क पर डस्टबिन में वेस्टेज को खंगाल रही थी...सामने एक लड़का हाथ में डंडा लिए खड़ा था...तभी, डस्टबिन में बिरयानी बालिका के हाथ लगी...उसने इसे निकाला...और, खाने लगी...। क्या-क्या गुल खिलाती है भूख। विपन्नों की नियति बयां करता यह शब्द शिल्प किसी फिल्म या कहानी का अंश नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के आसनसोल का वाकया है। वर्ष 2015 में एक रात यह मार्मिक दृश्य हैरत भरी निगाह से देख रहे थे एक निजी इंजीनियरिंग कॉलेज के शिक्षक चन्द्रशेखर कुंडू। इसने शिक्षक कुंडू को झकझोर दिया। मन-मस्तिष्क में उथल-पुथल मच गई, जीवन में सोच एवं राह बदल गई। मंथन चलता रहा और आखिर उसी रात उन्होंने भूख से तड़पते बच्चों की जिंदगी सुधारने-संवारने का बीड़ा उठा लिया। हाल ही राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़कर फिर चर्चा में आए कुंडू गत 4 साल से कुछ साथियों के साथ अन्न की बर्बादी रोकने, जरूरतमंद बच्चों को भोजन व शिक्षा मुहैया कराने में जुटे हैं।
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...तब वाकये से हुए थे व्यथित
बकौल चन्द्रशेखर कुंडू- 'उस रात मैं पैसे निकालने एटीएम काउंटर गया था। तभी दो बच्चों को इस हालत में देखा। उसी दिन मेरे पुत्र श्रीदीप के जन्मदिन की पार्टी के बाद काफी खाना बच गया था, जिसे मैंने फेंक दिया था। उस वाकये से व्यथित हुआ और सोचा, कितनी बड़ी गलती कर दी मैंने। उसी रात तय कर लिया कि हॉस्टल, कैंटीन, होटल तथा लोगों के घरों में बचने वाले अन्न इक_ा करूंगा एवं गरीब बच्चों में बांटूंगा।Ó
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स्टॉप फूड वेस्टेज का रिस्पांस
कुंडू ने छात्रों व मित्रों के साथ अन्न की बर्बादी पर लघु फिल्म स्टॉप फूड वेस्टेज बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर किया। जबरदस्त रिस्पांस मिला। कई होटल, कंपनी और हॉस्टल वाले उनको बचा हुआ खाना देने को तैयार हुए। दोपहर में जरूरतमंद बच्चों को खाना मिलने लगा। रात को समस्या होने लगी तो तीन सामुदायिक किचन शुरू करवाए। जरूरतमंद बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा के लिए शाम के वक्त आसनसोल, बांकुड़ा, पुरुलिया में 6 कोचिंग सेंटर खुलवाए। कोलकाता ही नहीं मुम्बई एवं दिल्ली में मेडिकल कैम्प लगवा रहे हैं। कुंडू ने लॉकडाउन के दौरान यौनकर्मियों तथा अम्फान तूफान के बाद सुंदरवन इलाके के लोगों को खाना मुहैया करवाया।
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सालाना 50 हजार करोड़ का अन्न हाता है बर्बाद
तीन लाख प्लेट से ज्यादा खाना बचा चुके कुंडू की कोशिश देश में हर साल बर्बाद होने वाले अनाज, फल और सब्जियां बचाने की है। आरटीआई से उन्हें 2016 में पता चला कि हर साल 22 हजार करोड़ टन अनाज बर्बाद होता है। वे कहते हैं कि यदि 10 फीसदी भी बचा लें तो सालभर के मिड डे मील की व्यवस्था हो जाए। कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार हर साल देश में करीब 50 हजार करोड़ का अन्न बर्बाद होता है। यानी हर साल जितने ब्रिटेनवासी खाते हैं, उतना हम बर्बाद कर देते हैं। यह उस देश की हालत है जहां अन्न को देवता मानते हैं।
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19 करोड़ से ज्यादा सोते हैं भूखे पेट
एक तरफ सार्वजनिक समारोहों, शादी-विवाह, उत्सव, पार्टी, कैंटीन और होटलों में खाने की बर्बादी होती है तो दूसरी तरफ देश के 19 करोड़ से ज्यादा लोग हर रात भूखे सोने को मजबूर होते हैं। पांच वर्ष से कम उम्र के करीब साढ़े चार हजार बच्चे रोज भूख और कुपोषण के चलते मर जाते हैं। 2019 के विश्व भूख सूचकांक में देश के 102 वें पायदान पर रहने से सारी स्थिति पानी की तरह साफ दिख रही है।
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ये हों उपाय
-फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया रखरखाव व वितरण खामियों को दुरुस्त करे।
-शादियों में फिजूलखर्ची व धन की बर्बादी के खिलाफ कानून बने।
-शादियों में मेहमानों व व्यंजनों की संख्या नियंत्रित हो।
-यदि हम आयोजन में न जा रहे हैं तो पहले सूचित कर दें।
-फल-सब्जियों को सडऩे से बचाने के लिए कोल्ड स्टोरेज बनवाएं।