
वहां थे पान के खेत, जूट की फसल, यहां रेल लाइन के किनारे मिला आसरा
कोलकाता. सन 1947 में भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के दर्द का अहसास लोग भूले भी नहीं थे कि पूर्वी पाकिस्तान से भी शरणार्थियों ने देश में शरण ली। अपनी मिट्टी और संस्कृति को मीलों दूर पद्मा नदी के तट पर विसर्जित कर आए शरणार्थियों में अधिकांश ने पश्चिम बंगाल के कोलकाता में फुटपाथ से लेकर रेल लाइनों के किनारे बनी कच्ची बस्तियों और सरकार की ओर से चिह्नित शरणार्थी शिविरों में लंबा समय काटा है। अपनी जड़ों से बिछडऩे का दर्द अब भी ताजा है।
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वैभवशाली अतीत
पूर्वी पाकिस्तान से नदिया के श्रीरामपुर बाजार के आसपास आकर बसे सैकड़ों शरणार्थी परिवार बताते हैं कि पूर्वी पाकिस्तान के फरीदपुर में पान के खेत थे, मालगुजारी जैसी व्यवस्था थी। ज्यादातर काश्तकार और मजदूर मुस्लिम थे। घर में जेवरात और अन्न की कोई कमी नहीं थी। फिर अचानक विभाजन की त्रासदी में रातोंरात बसाबसाया काम धंधा और घर छोड़ भागना पड़ा। इन्हीं में से एक परिवार की दूसरी पीढ़ी के विप्लव विश्वास बताते हैं कि जो भाग्यशाली थे उन्हें बोने-खाने को जमीनें मिलीं और जिनकी किस्मत ने साथ नहीं दिया, उन्हें दशकों शरणार्थी शिविरों में सरकारी सहायता के सहारे रहना पड़ा।
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समस्याग्रस्त वर्तमान
कोलकाता जिसे ब्रिटिश साम्राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर कहा जाता था, वह आजादी के तुरंत बाद शरणार्थियों से पट गया। लाखों शरणार्थियों ने शहर के सार्वजनिक फुटपाथों से लेकर शहर के आसपास की सरकारी, जमींदारों के अधीन वाली जमीनों पर डेरा डंडा डाल दिया। समस्या बढ़ी तो राज्य सरकार सक्रिय हुई। शरणार्थियों जिन्हें सरकारी भाषा में रिफ्यूजी कहा गया, के लिए सैकड़ों कॉलोनियां बनाई गईं। अब भी ऐसी सौ सै ज्यादा कॉलोनियां हैं, जहां रहने वाले शरणार्थी परिवारों के पास उनकी जमीनों के पट्टे नहीं हैं।
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जड़ों से दूर होने की पीड़ा
केन्द्र सरकार ने शरणार्थियों की स्थाई पुनर्वास की योजना बनाई। 1970 के दशक में दंडकारण्य योजना के तहत शरणार्थियों को अविभाजित मध्यप्रदेश के रायपुर स्थित माना ट्रांजिट कैंप भेजा गया। जहां से उन्हें सुदूर वनप्रांतों में जमीनें आवंटित की गईं। नदी आधारित भौगोलिक क्षेत्रों से आए शरणार्थी जंगल और पहाड़ आधारित भौगोलिक क्षेत्र में बसाए जाने लगे। गंगा-पद्मा के किनारे छोड़कर आए लोगों को शरण वहां मिली जहां खेती किसानी के लिए उर्वर भूमि तक न थी। शरणार्थी अपने संसाधनों और संस्कृति दोनों पर मंडराता खतरा साफ-साफ देख रहे थे।
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रिफ्यूजी कहलाए जाने का दंश
शरणार्थी और रिफ्यूजी इन दो शब्दों के बीच प्रशासन, सरकार और समाज की अपनी- अपनी परिभाषा है। सरकारों ने इन्हें रिफ्यूजी ही माना है। समाज में भी इसका असर दिखता रहा। यहां तक की खेल और खानपान में भी इस पार और उस पार की लकीर साफ दिखती है। इस पार यानी गंगा उस पार यानी पद्मा । इस पार मोहन बागान और उस पार ईस्ट बंगाल, इस पार यानी चिंगड़ी उस पार यानी हिलसा। विभाजन की इस सामाजिक अवधारणा के बीच रिफ्यूजी कहलाए जाने का दंश टीस देता रहा है।
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नागरिकता पर संशय
पूर्वी पाकिस्तान और उसके बाद बांग्लादेश से आए लाखों शरणार्थियों के सामने नागरिकता का भी संशय मंडराता रहा है। इस पार आए दलित और नमोशूद्रो सम्प्रदाय के लाखों लोग आज भी विचलित हैं। उनकी मांग दोनों देशों के प्रमुखों के साथ हुए समझौते की कट ऑफ डेट को खत्म करने की रही है। नए नागरिकता कानून से हिंदू शरणार्थियों की आस जगी, है लेकिन राज्य की राजनीतिक परिस्थिति में फिलहाल सीएएए लागू होता नहीं दिख रहा है।
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वोटबैंक राजनीति
सन 1947 से लेकर 70 के दशक तक शरणार्थी वामपंथियों के करीब रहे। यूनाइटेड सेंट्रल रिफ्यूजी काउंसिल (यूसीआरसी) ने आजादी के बाद कई दशकों तक शरणार्थियों के लिए बड़े आंदोलन किए। इन आंदोलनों के कारण ही राज्य सरकार को शरणार्थियों को उनके कब्जे से हटाने वाला कानून संशोधित करना पड़ा। सत्तर के दशक के आखिर में बड़ी संख्या में शरणार्थियों के मतों के सहारे सत्ता में आई वामपंथी सरकार भी शरणार्थियों को लेकर गंभीर नहीं रही। मरीचझापी में दंडकारण्य से आए शरणार्थियों पर की गई पुलिस कार्रवाई की क्रूरता आज भी राज्य के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है।
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फलने फूलने के अवसर
पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों के पुनर्वास से लेकर उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का सफर कठिन जरूर रहा पर सफल भी हुआ। नई कॉलोनियों में जमीनें पाने के बाद कोलकाता की अर्थव्यवस्था में शरणार्थी समुदाय का भी अहम योगदान है। शरणार्थी महिलाओं ने काम करना शुरू किया तो बांग्ला भद्रलोक की महिलाओं को भी दिशा मिली। समाज में शरणार्थी परिवारों के फलने-फूलने का दौर शुरू हुआ।
Published on:
02 Jul 2023 06:23 pm
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