
WEST BENGAL--सदाचार की प्रतिष्ठा के लिए यौन शिक्षा नहीं ब्रह्मचर्य प्रशिक्षण जरूरी: धींग
BENGAL NEWS-कोलकाता। ब्रह्मचर्य के साथ जप-तप अधिक फलदायी है। श्रीजैन रत्न हितैषी श्रावक संघ के तत्वावधान में आयोजित पर्युषण व्याख्यानमाला के सातवें दिन मंगलवार को जैन दर्शन के विद्वान साहित्यकार डॉ. दिलीप धींग ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि समाज में सदाचार की प्रतिष्ठा के लिए यौन शिक्षा नहीं ब्रह्मचर्य का प्रशिक्षण जरूरी है। ब्रह्मचर्य की साधना के साथ सारे जप तप सफल होते हैं। महावीर सदन के मदनरूपचंद भंडारी सभागार में उन्होंने कहा भगवान महावीर ने अणुव्रत की स्थापना कर मानवमात्र को मर्यादित जीवन का उपदेश दिया। उन्होंने संयममय जीवन जीने की कला सिखाई। संयम के पालन से अहिंसा और तप दोनों की आराधना हो जाती है। धींग ने कहा कि समाज में दुराचार की अप्रिय घटनाओं पर अंकुश के लिए मूल्यात्मक शिक्षा पर जोर दिया जाना चाहिए।
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जैन धर्म की वैवाहिक ब्रह्मचर्य अवधारणा से गांधी और जयप्रकाश नारायण भी थे
उन्होंने कहा कि जैन धर्म की वैवाहिक ब्रह्मचर्य अवधारणा से महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण भी प्रभावित हुए थे। वैवाहिक जीवन में आत्मसंयम को जैन ग्रंथों में शील-व्रत कहा गया है। शीलव्रती अखंड सौभाग्यशाली होता है। धींग ने कहा कि भगवान महावीर ने शील व्रत के माध्यम से स्त्री-स्वतंत्रता और स्त्री-पुरुष समानता का उद्घोष किया था। मर्यादा से ही जीवन मूल्यवान बनता है।संघ महामंत्री कमलचंद भंडारी ने बताया कि जैन रत्न हितैषी श्राविका संघ ने राजस्थानी भाषा में ....मेलो तपस्या रो व हिंदी में तप की जयकार गीत सामूहिक स्वर में गाकर सभा में रस घोल दिया। चांद भंडारी और अनु कांकरिया ने स्वाध्यायी बहुमान गीत गाया। अध्यक्ष डॉ. गुमान सिंह पीपाड़ा ने बताया कि स्वाध्यायी सुजल जैन और हार्दिक जैन ने आगम वाचन के साथ धर्म गीत प्रस्तुत किये। मंत्री अशोक कांकरिया ने बताया कि कुसुम कांकरिया, मंजू सुराणा और प्रमिला नाहर ने भी प्रस्तुतियां दीं। जितेंद्र मेहता ने सात उपवास का प्रत्याख्यान ग्रहण किया। बुधवार को महावीर सदन में संवत्सरी महापर्व की आराधना उपवास, आलोचना और प्रतिक्रमण के साथ की जाएगी।
Published on:
31 Aug 2022 04:01 pm
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