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क्यों 83 साल से बंगवासियों के दिलों पर राज कर रही पंडित वीरेन्द्र कृष्ण भद्र की महालया? जानिए यहां…..

WEST BENGAL NEWS: Bengalis celebrate MAHALAYA WITH JOY, जब भद्र ने खारिज कर दिया था इमर्जेंसी में सरकार का फरमान, आज भी भद्र की महालया बंगालवासियों के दिलों पर राज करती है , महालया से ही होता है बंगालियों के लिए दुर्गा पूजा का आगाज, बंगाल में महालया का मतलब भद्र की खनखती आवाज में महिषासुर मर्दनी का पाठ सुनना, पिछले 8 दशक से आज तक रेडियो पर लगातार जारी है पाठ

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क्यों 83 साल से बंगवासियों के दिलों पर राज कर रही पंडित वीरेन्द्र कृष्ण भद्र की महालया? जानिए यहां.....

क्यों 83 साल से बंगवासियों के दिलों पर राज कर रही पंडित वीरेन्द्र कृष्ण भद्र की महालया? जानिए यहां.....

कोलकाता (WEST BENGAL). बंगालवासियों के लिए महालया (MAHALAYA) का मतलब पंडित वीरेन्द्र कृष्ण भद्र (दिवंगत) की खनखती आवाज में महिषासुर मर्दनी पाठ ---‘दुर्गा सप्तशती’ के प्रमुख अंशों का संस्कृत में उच्चारण सुनना है, जो पिछले 8 दशक से आज तक रेडियो पर लगातार जारी है। देश-दुनिया में अपने अनोखे और आकर्षक पूजा पंडाल के साथ मनाए जाने वाले दुर्गा उत्सव से पहले महालया पर अल सुबह ठीक 4 बजे से रेडियो पर भद्र की आवाज में चंडी पाठ का प्रसारण होता है। बंगाल में धार्मिक रस्मों से नहीं, बल्कि रेडियो पर प्रसारित होने वाले भद्र की आवाज में चंडी पाठ से ही नवरात्र की शुरुआत होती है। बंगालियों के लिए दुर्गा पूजा का आगाज महालया से ही होता है। इसी दिन से देवी पक्ष प्रारंभ होता है और मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है। महालया का शाब्दिक अर्थ होता है-आनंद निकेतन। रेडियो पर 1936 में शुरू पहली बार महालया के दिन भद्र के प्ले महिषासुर मर्दनी पाठ को ब्रॉडकास्ट किया गया था, जो बाद में भद्र के भारी भरकम आवाज में सुनाए जाने वाला मां दुर्गा के आगमन का प्रतीक बन गया। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में सेवाएं दे चुके पूर्व कंट्रोलर ऑफ स्टोर स्वपन कुमार बनर्जी ने पत्रिका संवाददाता के साथ महालया की पूर्व संध्या पर शुक्रवार को खास बातचीत में भद्र के बारे में यह जानकारी दी। महालया पर अन्य नागरिकों की तरह ही भद्र के चंडी पाठ सुनने के शौकीन बनर्जी ने उनके कई रहस्यों को उजागर किया। उन्होंने कहा कि बतौर एक प्ले राइटर, एक्टर और डायरेक्टर भद्र ने संगीतकार पंकज मल्लिक के साथ बनाई गई उनकी कंपोजीशन महिषासुर मर्दनी ने उन्हें साहित्य-कला जगत के साथ-साथ धार्मिक रस्मोरिवाज का हिस्सा बनाकर न केवल बंगाल, बल्कि पूरे भारत में मशहूर कर दिया।

जब बंगालवासियों ने महालया पर उत्तम कुमार की आवाज को कर दिया था नका
देश में 1975-76 के इमर्जेंसी के दौरान ऑल इंडिया रेडियो नई दिल्ली की ओर से भद्र को उनके पाठ में कुछ संशोधन कर प्रसारित करने को कहा गया, तो उन्हें इससे साफ इंकार कर दिया था। 1976 में हेमंत मुखर्जी और बांग्ला फिल्मों के अभिनेता उत्तम कुमार को लेकर पाठ का रिसाइटेशन किया लेकिन वैसी लोकप्रियता नहीं मिली और बंगवासियों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। आखिरकार इसे पुराने फॉर्म में लौटना पड़ा और षष्ठी पर वापस भद्र की आवाज में ही प्रसारण करने पर तत्कालीन सरकार को मजबूर होना पड़ा। उस समय से आजतक आज भी भद्र की महालया बंगालवासियों के दिलों पर राज करती है।

लोगों की आत्मा में प्रवेश कर गई ...या देवी सर्वभूतेषु...
करीब 2.15 घंटे की महालया हमेशा-हमेशा के लिए भद्र की आवाज से जुडक़र रह गई है। इसमें भद्र की खनकती आवाज के उच्चारण---या देवी सर्वभूतेषु... और नमस्तुभ्यम--नमस्तुभ्यम....शब्द लोगों की आत्मा में प्रवेश कर गई है। कोलकाता के हर निवासी को यह एक तरह से उन्मादी उत्सव की भावना जगा कर रख देती है, जिसे केवल महसूस किया जा सकता।


टैगोर की अंतिम यात्रा के दौरान की थी रनिंग कमेंट्री
भद्र ने महिषासुर मर्दनी पाठ के अलावा 1941 में नीमतल्ला घाट पर कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर की अंतिम यात्रा के दौरान रनिंग कमेंट्री भी की थी। हर साल डीडी बांग्ला और रेडियो में सुबह-सुबह महालयाा सुनने के लिए कोलकाता के हर गली-मोहल्ले में बच्चे से लेकर युवा, महिलाएं और बुजुर्ग उमंग-उत्साह के साथ तैयार रहते हैं। जिस भारी आवाज से उन्होंने चंडी पाठ किया उनकी आवाज का दूसरा विकल्प आजतक रेडियो को नहीं मिला। 3 नवंबर 1991 को भद्र ने भले ही दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन आज भी उनकी आवाज महालाया के दिन गूंजती है।

इसलिए है बंगालवासियों के लिए है खास महालया

महालया पर्व पर विशेष रूप से बंगाली समुदाय के लोग पंडालों को सजाते हैं जबकि महिलाएं लाल नई साड़ी पहनकर देवी दुर्गा के आगमन की तैयारी करती हैं। नवरात्र शुरू होने से एक दिन पहले मनाए जाने वाले महालया का बंगाल में खास महत्व इसलिए है कि इसी दिन से मां दुर्गा की प्रतिमाएं बनाने वाले कलाकार देवी की आंखों को तैयार कर उसमें रंग भरते हैं। पौराणिक मान्यताों के अनुसार दुर्गा ने 9 दिन और 9 रात तक चले घमासान युद्ध में असुरों के राजा महिषासुर का वध किया था। इसी युद्ध से पहले महालया को दुर्गा के धरती पर आगमन दिवस के तौर पर मनाया जाता है। इसी दिन असुरों-देवों के बीच जंग में काफी संख्या में देव-ऋषियों की मृत्यु हुई थी और इसलिए उन्हें तर्पण देने की खातिर महालया होता है।