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अब केरल ही नहीं कोंडागांव में भी लगाई जाएंगी बेशकीमती पिपली की फसल, फेफड़े सहित कई रोगों की रामबाण दवा

Pippali Farming: एमडीपी 16 को छत्तीसगढ़ के लगभग सभी जिलों के साथ ही सीमावर्ती राज्यों जैसे ओडिशा, झारखंड, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना तथा महाराष्ट्र के भी कई क्षेत्रों में सफलता पूर्वक उगाने का दावा करते है।टीम का मानना है कि, इसे एक बार लगाने के बाद इसकी खेती में कोई अतिरिक्त विशेष लागत और मेहनत नहीं है।

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अब केरल ही नहीं कोंडागांव में भी लगाई जाएंगी बेशकीमती पिपली की फसल, फेफड़े सहित कई रोगों की रामबाण दवा

Pippali Farming: एमडीपी 16 को छत्तीसगढ़ के लगभग सभी जिलों के साथ ही सीमावर्ती राज्यों जैसे ओडिशा, झारखंड, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना तथा महाराष्ट्र के भी कई क्षेत्रों में सफलता पूर्वक उगाने का दावा करते है। टीम का मानना है कि, इसे एक बार लगाने के बाद इसकी खेती में कोई अतिरिक्त विशेष लागत और मेहनत नहीं है। एक बार लगाने के बाद, इससे कई वर्षों तक उत्पादन आसानी से लिया जा सकता है। वर्तमान में 1 एकड़ में लगभग 480- 500 किलो सूखी पिपली प्राप्त होती है। जिससे किसान को उत्पादन होने पर लगभग सालाना प्रति एकड़ एक लाख तक हो सकती है।

फेफड़े सहित कई रोगों की रामबाण दवा

पिपली का वनस्पतिक नाम पाइपर लांगम है। इससे सैकड़ों तरह की आयुर्वेदिक दवाइयां बनती रही हैं। यह बैक्टीरियारोधी तो है ही तथा हाल के ही शोध में यह पाया गया कि इसमें पिपरलीन पाया जाता है जो कि मलेरियारोधी भी है। यह पेट की बीमारियों, फेफड़ों की बीमारियों सहित कई रोगों में की रामबाण औषधि मानी जाती है।

अब तक केवल केरल व उत्तर पूर्वी राज्यों के कुछ क्षेत्रों की फसल मानी जाने वाली बहुमूल्य हर्बल पिपली की खेती में अब कोंडागांव का नाम भी जुड़ गया है। यह सफलता कृषि नवाचारों के लिए पहचाने जाने वाले नगर के किसान डॉ राजाराम त्रिपाठी के नेतृत्व में उनके हर्बल समूह की टीम ने कर दिखाया है। डॉ. त्रिपाठी ने बताया कि पिपली जमीन पर ही फैलने वाली लतावर्गीय वनौषधि है। इसके फलों को सुखाकर उपयोग किया जाता है। जिसे पिपली, पिप्पली या लेंडी पीपल के नाम से भी जाना जाता है। यह कालीमिर्च की तरह दिखती है। नई रिसर्च ने अब बस्तर में इसके व्यवसायिक खेती की उम्मीदें बढ़ा दी है।

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परंपरागत पीपली से गुणवत्ता में श्रेष्ठ

मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म तथा रिसर्च सेंटर में पिछले कुछ वर्षों के शोध के बाद इसकी नई प्रजाति का विशुद्ध जैविक परंपरागत पद्धति से विकास किया है। इसे ‘मां दंतेश्वरी पीपली -16’( एमडीपी 16) का नाम दिया गया है। कोंडागांव में इस प्रजाति के फलों का आकार भी बेहतर है, तथा यहां उगाई गई पिपली के प्रयोगशाला परीक्षण से पता चला है कि कोंडागांव की पिपली की गुणवत्ता भी परंपरागत पीपली से अच्छी है।

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के वैज्ञानिक डॉ. के.के. साहू ने बताया कि पिपली मल्टीलेयर फार्मिंग हैं, इसका उत्पादन मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म में किया जा रहा है, यहां की जलवायु पिपली के उत्पादन के अनुकूल है इस कारण व्यवसायिक उत्पादन भी हो सकता है तथा इससे भूमि भी स्वस्थ बनी रहती है।