
नीति के आगे हारती मेहनत- वो तो लेंगे १५ क्विंटल, अंजनी ने उगा दिया है ४२ क्विंटल
कोरबा. जिले के कई इलाकों में सूखे जैसी स्थिति है, किसानों की फसल चौपट हो गई है। इसी बीच नगर निगम कोरबा के तहत स्थित ग्राम दादरखुर्द की एक महिला किसान ने धान का बंपर उत्पादन कर अन्य किसानों में उम्मीद की किरण का संचार कर रही है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि प्रतिएकड़ जो धान उसने उगाया है उस मेहनत का वास्तविक हक उसे नहीं मिल सकेगा। क्योंकि नियमानुसार सरकार प्रति एकड़ १५ क्विंटल धान ही खरीदेगी।
कृषि विभाग से मिली जानकारी के अनुसार अंजनी ने परंपरागत तरीके की बजाए आधुनिक पद्धति से धान की खेती की थी। वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी राजेश भारती ने बताया कि अंजनी ने वैज्ञानिक पद्धति से अधिक उपज लेने का गौरव प्राप्त किया है। आलम यह है कि अंजनी की ओर से रोपे गए पौधे में कम से कम १५ और अधिकतम ४८ कंसे प्रति पौधे निकले हैं। महिला किसान को इस उपलब्धि के लिए पुरस्कार के लिए नामिनेट किया गया है।
भारती ने बताया कि विभाग की ओर से धान की खेती आरंभ करने से पहले एक मीटिंग का आयोजन किया गया था। इस मीटिंग में ५० किसान शामिल हुए थे। इस दौरान उन्हें परंपरागत खेती को छोडक़र वैज्ञानिक खेती के लिए किसानों को पे्ररित किया गया। इनमे से केवल अंजनी ही इसके लिए तैयार दिखी। इसके बाद विभाग के अधिकारियों जिसमें राजेश भारती के अलावा कृषि विस्तार अधिकारी संजय पटेल के निरीक्षण व मार्गदर्शन में खेती की गई।
और भी हैं कतार में
अधिकारियों ने बताया कि अंजनी के पास सिंचाई सहित मजदूर आदि की पर्याप्त सुविधा थी इसलिए सूखे के दौरान भी उसके धान की फसल को कोई नुकसान नहीं हुआ। हलांकि अंजनी की फसल को देखने के बाद अन्य किसान भी इसके लिए आगे आए थे पर समय बीत गया था, फिर भी कोशिश की है लेकिन उन्हें अंजनी की तरह उत्पादन तो नहीं मिला है पर पहले से बेहतर उत्पादन मिला है।
कहा कहीं और बेचूंगी
जब महिला किसान अंजनी से पूछा गया कि आपने प्रति एकड़ लगभग ४२ क्विंटल धान की फसल उगाई है। तो इस धान का क्या करेंगी तो अंजनी ने कहा कि वो उसे सोसायटी में ले जाएगी और बेचेगी। फिर जब यह पूछा गया कि वहां तो केवल १५ क्विंटल की खरीदी होगी बाकि जो धान बचेगा उसका क्या करेंगी तो उसने मायूस होते हुए कहा कि बाकि को बाजार ही बेचना पड़ेगा। ऐसे में यह तय हो गया कि किसान लाख मेहनत कर ले उसकी मेहनत पर कभी नीति पानी फेर देती है तो कभी नीयत झटके देता है।
क्या हुआ फायदा
अधिकारियों का कहना है कि अंजनी के इस मेहनत का फायदा तो मिला ही है साथ ही रसायनिक खाद की लागत में ५० प्रतिशत की कमी आई, मजदूरी में भी ५० प्रतिशत की बचत हुई है। हलांकि इनका परिवार खुद ही इस खेती में लगा हुआ था। हलांकि गनीमत यह है कि उसने ये खेती केवल ढाई एकड़ में की थी। जबकि उसके पास कुल १० से १२ एकड़ जमीन है। कहा यह जा रहा है कि ढाई एकड़ के उत्पादन को १० एकड़ में विभाजित कर उसे बेच सकती है,
पर ये कोई समाधान नहीं है।
विशेष बातें
- १२ से १५ दिन के पौधे का उपयोग
- २५ बाई २५ की कतार बोनी
- हर दस दिन में विभिन्न सस्य क्रियाओं का पालन
- विशेष जैविक व सूक्ष्म जैविक पोषक तत्वों का प्रयोग
- जैविक कीटनाशक का प्रयोग
- रसयानिक निंदानाशक के बदले जैविक का प्रयोग
पिछले बार की तुलना में बहुत धान हुआ है। सोसायटी में लेकर जाएंगेे, जो बच जाएगा उसे बाहर बाजार में बेच देंंगे।
अंजनी राठिया, महिला किसान
विभाग के मार्गदर्शन व निरीक्षण में पूरी खेती करवाई गई थी। प्रति एकड़ लगभग ४२ क्विंटल धान हुआ है। हां ये दिक्कत तो आएगी कि सोसायटी में प्रति एकड़ १५ क्विंटल ही खरीदा जाएगा।
राजेश भारती, एसएडीओ, कृषि
Published on:
01 Dec 2018 11:19 am
बड़ी खबरें
View Allकोरबा
छत्तीसगढ़
ट्रेंडिंग
