
किसानों की चिंता बढ़ी, कहा- इस बार सूखे जैसे हालात, बारिश नहीं हुई तो परिवार चलाना हो जाएगा मुश्किल
कोरबा. जिला मुख्यालय के लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम धौंराभांठा गांव जंगल के बीच बसा है। यहां के लोगों की अजीविका का मुख्य जरिया धान की खेती (Paddy Farming) और लघु वनोपज के संग्रहण से होने वाली आय है। सावन का महीना चालू हो गया है, लेकिन गांव के आसपास स्थित खेतों से धूल उड़ रहे हैं। पानी की कमी से खेत में दरार पडऩे लगी है।
धान (Paddy) का थरहा मुरझाने लगा है। ऊपर से गांव के पास स्थित जंगल में हाथियों के आने से किसानों की चिंता बढ़ गई है। ग्रामीणों के समक्ष हाथियों से खुद के साथ फसल को बचाए रखने की चुनौती है। धौंराभांठा हाथी प्रभावित क्षेत्र है। धौंराभाठा के आसपास भी सभी गांव की समस्या एक जैसी ही है। पूरा कोरबा वन मंडल हाथियों से प्रभावित क्षेत्र है।
पत्रिका की टीम ने हाथी प्रभावित क्षेत्र धौंराभाठा का दौरा कर ग्रामीणों से उनकी समस्याएं जानी। ग्राम धौंराभांठा में खेती किसानी करके परिवार का पालन पोषण करने वाले प्रेम सिंह बताते हैं कि इस साल गांव वालों के समक्ष दोहरी चुनौती है। हाथी के हमले में अपनी मां को खो चुके प्रेम सिंह खेत में पड़ी दरार की ओर को दिखाते हुए कहते हैं कि सावन में धान (Paddy) की खेत में लबालब पानी रहता था। इस साल खेत मेें दरार पड़ी है। हफ्तेभर पहले हुई बारिश में गांव के कुछ लोगों ने खेत की जोताई करके धान की बीज और खाद डाल किया था। अभी तक बीज अंकुरित नहीं हुए। बारिश नहीं हुई तो जोताई और बोआई में लगा पैसा भी व्यर्थ हो जाएगा।
गांव की खेत में हमारी मुलाकात 82 वर्ष की महिला हीरामति से भी हुई। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में बाहर से आमदनी का कोई जरिया नहीं है। पूरा परिवार खेती-बाड़ी पर निर्भर है। धान की अच्छी पैदावार होने से साल भर चावल खरीदनी नहीं पड़ती है। इस बार सूखे जैसे हालात हैं। बारिश नहीं हुई तो परिवार चलाना मुश्किल हो जाएगा। गांव के लोगों को दूसरे गांव में जाकर रोजी मजदूरी तक करनी पड़ सकती है। हीरामति आने वाली चुनौतियों को लेकर चिंतित हैं।
गांव में रहने वाले जनता राठिया भी पेशे से किसान हैं। ग्रामीणों की पीड़ा को भली भांति समझते हैं। जनता राठिया बताते हैं कि धान (Paddy) की थरहा लगी नहीं है। हाथियों का झुंड अभी से परेशानी का कारण बन गया है। झुंड धौंराभांठा की खेतों में पहुंच जाता है। फसल को पैरों से रौंद देता है। किसानों की मेहनत को बर्बाद कर देता है। राठिया फसल के नुकसान के आंकलन के सरकारी तरीके से भी असंतुष्ट हैं। उनका कहना है कि खेत की जोताई से लेकर बोआई तक प्रति एकड़ 15 से 18 हजार रुपए तक खर्च आता है।
हाथी (Elephant) से फसल का नुकसान होने पर वन विभाग के कर्मचारी अनुमानित आंकलन प्रतिशत में करते हैं। ग्रामीणों को नुकसान की तुलना में भरपाई कम होती है। उन्होंने बताया कि पिछले साल हाथियों के हुए फसल का नुकसान का मुआवजा भी सरकार की ओर से इस साल तक नहीं दिया गया है। कर्मचारी विभाग के बजट नहीं होने का हवाला दे रहे हैं। (Korba Paddy Farming)
मचान पर कट रही रात
धौंराभांठा के लोगों ने फसल की सुरक्षा के लिए आसपास स्थित पेड़ों पर कई मचान बनाए हैं। करम सिंह ने बताया कि रात में गांव के लोग मचान पर चढ़कर रतजगा करते हैं। हाथियों (Elephants) से अपनी फसल और बाड़ी को बचाते हैं।
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Published on:
18 Jul 2019 11:41 am
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