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CG News: हसदेव नदी में घुला सफ़ेद जहर, राखड़ के मलबे से जहरीली हुई नदी, मटमैले पानी में तैर रहे जहरीले कण

CG News: नदी का पानी सफेद जहर में तब्दील हो चुका है, जिससे शहर से लेकर गांवों तक हाहाकार मचा है। रविवार से जारी राखड़ का यह तांडव सोमवार को भी नहीं थमा।

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कोरबा

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Love Sonkar

Apr 21, 2026

CG News: हसदेव नदी में घुला सफ़ेद जहर, राखड़ के मलबे से जहरीली हुई नदी, मटमैले पानी में तैर रहे जहरीले कण

भीषण धमाके के साथ राखड़ बांध फटा (Photot Patrika)

CG News: कोरबा जिले में बिजली संयंत्रों से निकलने वाली जहरीली राख अब केवल एक अपशिष्ट नहीं, बल्कि मौत का सामान बन चुकी है। रविवार को एचटीपीएस (हसदेव ताप विद्युत गृह) के राखड़ बांध के फूटने से हजारों टन मलबा जीवनदायिनी हसदेव नदी में समा गया। यह कोई साधारण तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि पर्यावरण और लाखों जिंदगियों के साथ किया गया एक खिलवाड़ है। सोमवार तक नदी का पानी सफेद जहर में तब्दील हो चुका है, जिससे शहर से लेकर गांवों तक हाहाकार मचा है। रविवार से जारी राखड़ का यह तांडव सोमवार को भी नहीं थमा।

बांध से निकल रहा जहरीला पानी सीधे नदी की धारा में मिल रहा है। सफेद मटमैले पानी में तैरते राख के कण इस बात का प्रमाण हैं कि नदी का इकोसिस्टम पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन हर बार इसे हादसा बताकर फाइलें बंद कर दी जाती हैं। हसदेव का पानी न केवल कोरबा, बल्कि जांजगीर-चांपा जैसे अन्य जिलों की भी प्यास बुझाता है और सिंचाई का मुख्य स्रोत है।

अब यह जहर खेतों और घरों तक पहुंचने को तैयार है। कोरबा की पहचान अब ऊर्जाधानी से ज्यादा राखड़धानी के रूप में होने लगी है। अगर अब भी सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो वह दिन दूर नहीं जब हसदेव नदी केवल इतिहास के पन्नों में जीवित रहेगी और आने वाली पीढ़ियां इस सफेद जहर के साये में जीने को मजबूर होंगी।

एक्सपर्ट व्यू: 'नॉन-टॉक्सिक' के नाम पर बड़ा धोखा

कोयले की इस राख में लेड (सीसा), क्रोमियम, कैडमियम, मर्करी और आर्सेनिक जैसे घातक हैवी मेटल्स होते हैं। सरकार ने अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए राख को नॉन-टॉक्सिक (गैर-जहरीला) श्रेणी में डाल रखा है, जबकि शोध बताते हैं कि यह कैंसर और किडनी जैसी लाइलाज बीमारियों का बड़ा कारण है। नदी में इस राख का मिलना जलीय जीवों और इंसानों के लिए स्लो पॉइजन का काम कर रहा है।

-श्वेता नारायण, पर्यावरणविद् व शोधकर्ता

जांच के नाम पर हो रही लीपापोती?

घटना के बाद पर्यावरण संरक्षण विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचकर जांच का दावा तो कर रहे हैं, लेकिन हकीकत बताने से कतरा रहे हैं। आखिर मानसून से पहले बांधों की मजबूती की जांच क्यों नहीं की गई? क्यों बार-बार बांध फूटने के बावजूद ठोस मरम्मत के बजाय केवल जुगाड़ से काम चलाया जाता है।

बड़ी लापरवाही के संकेत

पेयजल संकट: पूर्व में भी राखड़ फिल्टर प्लांट की पाइपलाइन तक पहुंच गया था, जिससे जलापूर्ति ठप हो गई थी।
खेती की बर्बादी: नदी तट के खेतों में राख जमने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति हमेशा के लिए खत्म हो रही है।

भ्रष्टाचार की बू: रखरखाव के बजट का बंदरबांट ही बांधों के कमजोर होने की असली वजह है।
दिखावे की कार्रवाई: निलंबन पर्याप्त नहीं

प्रबंध निदेशक एसके कटियार ने एक एई और डीई को निलंबित कर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या दो छोटे अधिकारियों की बलि चढ़ाने से हसदेव नदी का जहर साफ हो जाएगा? पर्यावरण प्रेमियों की मांग है कि संयंत्र के शीर्ष प्रबंधन और जिम्मेदार ठेकेदारों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होना चाहिए।

एचटीपीएस राखड़ बांध फूटने की घटना के मामले में पहले ही एक एई, डीई को निलंबित किया गया है। एक अधिकारी का तबादला किया गया है। उनके खिलाफ विभागीय जांच भी हो रही है। इस मामले में आगे भी जांच चल रही है।

एसके कटियार, प्रबंध निदेशक, छत्तीसगढ़ बिजली उत्पादन कंपनी