20 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

फुटबॉल की ऐसी दीवानगी: कोल माइंस के दो कोहिनूर ने लिखा इतिहास, 50 साल से उनके नाम पर कर्मियों की सैलरी से नेशनल टूर्नामेंट

माइंस कर्मी अपनी एक-एक दिन की सैलरी चंदे में देकर नेशनल फुटबॉल टूर्नामेंट करा रहे हैं।

2 min read
Google source verification
फुटबॉल की ऐसी दीवानगी: कोल माइंस के दो कोहिनूर ने लिखा इतिहास, 50 साल से उनके नाम पर कर्मियों की सैलरी से नेशनल टूर्नामेंट

फुटबॉल की ऐसी दीवानगी: कोल माइंस के दो कोहिनूर ने लिखा इतिहास, 50 साल से उनके नाम पर कर्मियों की सैलरी से नेशनल टूर्नामेंट





बैकुंठपुर।एसइसीएल चरचा कॉलरी के सब एरिया मैनेजर और सिविल इंजीनियर की फुटबॉल के प्रति ऐसी दीवानगी रही, कि छोटे से ग्राउंड में कॉम्पीटिशन कराया दिया और अनोखी परंपरा कायम कर इतिहास लिख दिया। आज ५० साल से उनके नाम पर माइंस कर्मी अपनी एक-एक दिन की सैलरी चंदे में देकर नेशनल फुटबॉल टूर्नामेंट करा रहे हैं।
ये कहानी है, एसइसीएल बैकुंठपुर एरिया के चरचा कॉलरी आरओ में पदस्थ रहे स्व आर शेषन और सिविल इंजीनियर स्व एमएल महाजन की। सब एरिया मैनेजर को फुटबाल से बहुत लगाव था। इसलिए वर्ष १९६५-६६ में चरचा कॉलरी के एक छोटे से ग्राउंड में प्रतियोगिता की शुरुआत की। टूर्नामेंट का नाम रनिंग शील्ड रखा गया था। जिसमें आसपास के शहरी व ग्रामीण टीम हिस्सा लेने पहुंचने लगीं थी। कॉम्पीटिशन में फंडिंग की व्यवस्था करने नायाब तरीका निकाला और कोल कर्मी-अफसरों से राय मशविरा कर एक-एक दिन सैलरी चंदा स्वरूप देने मनाया। जो पिछले ५० साल से एक परंपरा बन गई है। वहीं एसइसीएल की मदद से कुछ साल बाद श्रमवीर स्टेडियम का निर्माण हुआ। फिर राष्ट्रीय स्तर की टीमें पहुंचने लगी और दर्शकों की भीड़ की वजह से बैठने की जगह नहीं मिलती थी। इसी बीच सब एरिया मैनेजर की हादसे में मौत हो गई थी। फिर रनिंग शील्ड कॉम्पीटिशन का नाम बदलकर १९७३-७४ को अखिल भारतीय शेषन ममोरियल गोल्ड कप फुटबॉल टूर्नामेंट रख दिया। जो पिछले ५० साल से गोल्ड कप टूर्नामेंट के नाम पर होता है। यह छत्तीसगढ़ के नामी टूर्नामेंट में शामिल है।

महाकुंभ का रूप लिया, ४७वां टूर्नामेंट में १३ राज्य की १६ टीम पहुंची है
अखिल भारतीय शेषन ममोरियल गोल्ड कप फुटबॉल टूर्नामेंट चरचा कॉलरी में एक उत्सव की तरह होता है। जिसमें बड़ी संख्या में कॉलरी कर्मी, परिवार और आसपास के ग्रामीण दर्शक पहुंचते हैं। सब एरिया मैनेजर की परंपरा को कायम कर कर्मी-अफसर अपनी एक-एक दिन की सैलरी चंदा स्वरूप देते हैं। जिससे टूर्नामेंट का इनाम सहित अन्य खर्च करते हैं। सबसे खास बात यह है कि एसइसीएल पूरा मैनेजमेंट संभालता है। कोरोना कॉल के कारण तीन साल टूर्नामेंट नहीं हुआ। बावजूद वर्ष २०२३ में ४७वां टूर्नामेंट चल रहा है। जिसमें १३ राज्य की १६ नेशनल टीम बारी-बारी से पहुंचने लगी है।

सरगुजा अंचल का सबसे बड़ा फुटबाल ग्राउंड स्व एमएल महाजन के नाम पर
स्व महाजन सिविल इंजीनियर के रूप में कार्यरत थे। एकमात्र ग्राउंड श्रमवीर स्टेडियम में दर्शकों की भारी भीड़ को देख शहर किनारे पथरीली भूमि पर भव्य ग्राउंड बनाने का संकल्प लिया। मामले में वर्ष १९८५ में भव्य ग्राउंड निर्माण कराने आधारशिला रखी। जिसका नाम चरचा स्टेडियम था। स्टेडियम बनाने में करीब पांच साल का समय लगा। लेकिन उद्घाटन से पहले उनकी मौत हो गई थी। मामले में वर्ष २००४ में एसइसीएल बिलासपुर के कार्मिक निदेशक की मौजूदगी में चरचा स्टेडियम का नामकरण स्व एमएल महाजन के नाम पर हुआ।

यह ४७वां गोल्ड कप टूर्नामेंट है। कोरोना कॉल में तीन साल टूर्नामेंट नहीं हुआ। टूर्नामेंट की शुरुआत करने वाले सब एरिया मैनेजर स्व आर शेषन और स्टेडियम का नाम सिविल इंजीनियर स्व एमएल महाजन के नाम पर रखा गया है। दोनों की फुटबॉल के प्रति बहुत लगाव था। टूर्नामेंट कराने चरचा कॉलरी के कर्मी व अफसर एक-एक दिन की सैलरी देते हैं।
रियाजुद्दीन, सचिव अखिल भारतीय शेषन मेमोरियल गोल्ड कप फुटबॉल टूर्नामेंट चरचा कॉलरी