कोटा. ”न शरद की आंखों के आंसू थम रहे थे, न विष्णु कांत की आंखें की नमी जा रही थी। इन आंसुओं में दर्द भी था और खुशी भी। चार दशक पहले अपने एक भाई मुरली उनसे बिछुड़ गया था, खुशी इस बात की कि आज वही भाई गले से लगा तो साथ बिताया बचपन सामने आ गया। बेशक तब वे १० वी ११ वी के विद्यार्थी थे और आज विष्णु कांत ६३ बरस के हो गए हैं और शरद एक दो साल में सेवानिवृत्त हो जाएंगे।
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कहानी है, अपना घर में रहने वाले ‘प्रभुजीÓमुरलीधर दुबे उर्फ तुषार कांत द्विवेदी की। तुषारकांत ४२ वर्ष बाद परिजनों से मिले। पॉलीटेक्निक कॉलेज परिसर स्थित अपना घर में मुरलीधर के भाई शरद और विष्णुकांत लेने के लिए आए। मुरलीधर उत्तर प्रदेश के बनारस के निकट औराई जिले के सहसपुर कस्बे रहने वाले हैं।
दसवीं में फैल हुए तो छोड़ दिया घर
मुरलीधर को लेने आए शरद कांत ने बताया कि हम तीनों भाई लगभग एक दो कक्षा ही आगे पीछे थे। तुषार सांइस का स्टूडेंड था, पढऩे में भी तेज था, पर न जाने कैसे यह फैल हो गया। इसके बाद मुरलीधर ने १९७६-१९७७ में घर छोड़ दिया। इसके बाद कई वर्षों तक माता पिता व परिवार के लोग चैन से नहीं रहे। जहां जैसे सूचना मिलती इसे ढूंढते पर कहीं पता नहीं चला। इंतजार में पिता सदानंद तो १५ बरस पहले चल बसे। मां बसंती बाई आज भी इंतजार में है। मां को विश्वास नहीं हो रहा है कि बेटा जिंदा है ।
दीपावली पर आए थे अपना घर
मुरलीधर को दीपावली के दिन अपना घर लाया गया था। अपना घर आश्रम समिति के वित्त सचिव दैवेन्द्र आचार्य बताते हैं किसी की सूचना पर उन्हें लेकर आए थे। बिल्कुल कमजोर थे और मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं थी। इसके बादसे ही ये यहीं रह रहे हैं।
ऐसे मिले परिजन से
कॉउंसलिंग के दौरान मुरलीधर दुबे ने बताया कि वो उत्तर प्रदेश के बनारस के निकट औराई जिले के सहसपुर कस्बे रहने वाले है। पढ़ाई के दौरान फेल होने के कारण घर से बिना बताए निकल गए थे। इस पर नर्सिंग स्टॉफ एवं काउंसलर ने औराई थाने में सम्पर्क साधकर पुलिस को पूरी कहानी बताई। पुलिस ने परिवाजनों को ढूंढकर सेवा साथी अब्दुल से मुरलीधर के परिवारजनों से करवाई। इस पर गुरुवार को मुरलीधर के भाई उन्हें लेने पहुचें।
दिल्ली से मुम्बई तक के फैरे
मुरलीधर ने बतायाकि वे दसवी में असफल रहने से इतने खफा थे कि आत्महत्या का विचार कर बैठे थे। वह अपनी मां की साड़ी से फंदा लगाना चाहते थे, लेकिन कड़े तक नहीं पहुंचे। इसपर उन्होंने 100 रुपये पास में रखकर घर छोड़ दिया और मुंबई चले गए, फिर दिल्ली व पंजाब में रहे। 1987 में कोटा आ गए, यहां कचौरी की दुकान पर काम किया। मजदूरी की। खलासी व ड्राइवरी का कार्य भी किया।