chaitra Navratri- 2023: कोटा. चैत्र शुक्ल प्रतिपदा यानी 22 मार्च से चैत्र नवरात्र शुरू हो रहे हैं। यूं तो चंबल की नगरी कोटा में देवी के कई मंदिर हैं, जहां हर नवरात्र विशेष आयोजन होते हैं और मां का दरबार जैकारों से गूंजता है। बात शक्ति की भक्ति के विशेष दिन नवरात्र की हो रही है तो चलो कोटा में िस्थत डाढ़ देवी माता के दर्शन को चलते हैं । कोटा की धरा पर देवी के कई प्रमुख मंदिर हैं। इन्हीं में से एक है डाढ देवी माता का मंदिर। मंदिर शहरवासियों के लिए आस्था का प्रमुख केन्द्र है तो शिल्पकला व सौन्दर्य में भी अनूठा है। मंदिर का इतिहास भी विशेष है।
इसलिए डाढ़ देवी हो गया नाम
मंदिर में स्थापित देवी की प्रतिमा इस तरह से है कि देवी की डाढ़ बाहर निकली हुई प्रतीत होती है। इसी कारण लोग देवी का नाम ही डाढ़ देवी के नाम से पुकारने लगे और मंदिर का नाम भी डाढ़ देवी माता मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। वास्तव में तो डाढ़ देवी रक्त दंतिका देवी का स्वरूप है। देवी के दर्शन करने मात्र से असीम आनंद का अनुभव होता है।
राजपरिवार से जुड़ाव
कोटा के समीप उम्मेदगंज क्षेत्र के जंगलों में बरसाती नदी के किनारे डाढ़ देवी का प्राचीन मंदिर स्थित है। देवस्थान विभाग में संकलित जानकारी के यह आठवीं-दसवीं शताब्दी का हैं। इतिहासविद् फिरोज अहमद के अनुसार मंदिर के शिल्प मंदिर से संबिन्धत अन्य जानकारियों के अनुसार मंदिर 13 वीं-14वीं शताब्दी का है। अहमद बताते हैं कि डाढ़ देवी कैथून के तंवर क्षत्रियों की इष्ठ थी। मंदिर भी तंवर शासकों ने ही बनवाया था।
रियासतकाल में नवरात्र दशहरा के समय कोटा के महाराव देवी के पूजन के लिए लवाजमें के साथ जाते थे। पूजन के समय तोप दागी जाती थी। कुछ बदलाव के साथ कुछ परम्पराएं अब भी निभाई जाती है। आज भी पूर्व राजपरिवार के सदस्य नवरात्र में दाढ़ देवी के दर्शन व पूजन को जाते हैं। दाढ़ देवी न सिर्फ पूर्व राजपरिवार के लिए आस्था का केन्द्र रही, बल्कि शहर वासियों की भी देवी के प्रति अगाध श्रद्धा है।
वर्ष में दो बार लगता है मेला
चैत्र व शारदीय नवरात्र में यहां मेला लगता है। लोग विभिन्न मान्यताओं को लेकर देवी के दर्शन करने आते हैं। मनोकामनाएं पूर्ण होने पर लोग देवी को भोग लगाते हैं। रसोई व गोठ बाटियोंं के आयोजन होते रहते हैं। मंदिर उत्तरमुखीय है।
कुंड के पानी से कीट मुक्त होती है फसल
मंदिर के सामने एक कुंड है। मंदिर से जुड़े लोग बताते हैं कि इस कुंड के पानी की अपनी तासिर है। लोग बताते हैं कि फसलों में कीट लग जाते हैं तो लोग मान्यताओं के अनुसार कुंड के पानी का छिड़काव करते हैं। फिरोज अहमद बताते हैं कि मंदिर के पास जंगल में पहले केवड़े के पेड़ भी थे। बारिश में यहां की छटा देखते ही बनती थी। मंदिर की व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी देवस्थान विभाग के पास है।