
कोटा के महाराव भीमसिंह ने तोड़ी थी छुआछूत की बेडिय़ां, दलितों को दिया था अन्नकूट लुटाने का अधिकार
कोटा. किसी को उम्मीद नहीं थी कि कोटा के राजा अछूत माने जाने वाली दलित और शूद्र जातियों के साथ ऐसा बर्ताव भी कर सकते हैं। ( kota princely state ) जिस दौर में इन जातियों के लोगों का सामने से गुजरना भी पाप माना जाता था, उस वक्त से ही कोटा के राजाओं ने ( kota Maharaja of princely state ) अन्नकूट महोत्सव ( Annakoot Celebration ) में प्रसाद वितरण का एकाधिकार इन जातियों के लोगों को सौंप दिया था। गोवर्धन पूजा (Govardhan Puja ) होने और ठाकुर जी का भोग लगने के बाद अछूत माने जाने वाली इन जातियों का व्यक्ति सबसे पहले कोटा के महाराव को अन्नकूट का प्रसाद देता। ( kota Maharao Bhim Singh ) उसके बाद अपने ही हाथों से समारोह में आने वाले अतिथियों राजा-महाराजाओं, मनसबदारों और ठिकानेदारों के साथ-साथ भगवान बृजनाथ के सभी भक्तों को प्रसाद बांटने की जिम्मेदारी दलित जाति के इसी व्यक्ति के हाथ में सौंप दी जाती।
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इतिहासकार प्रो. जगत नारायण बताते हैं कि दीपावली के दूसरे दिन कोटा में राजपरिवार की ओर से बड़ी धूम-धाम के साथ गोवर्धन पूजा एवं श्री बृजनाथ जी के अन्नकूट महोत्सव का आयोजन किया जाता था। अन्नकूट और पूजा का आयोजन बृजनाथ जी के मंदिर में सुबह करीब 11 बजे से शुरू होता। गोवर्धन पूजा के बाद गायों से उन्हें घुंघाया जाता था और मुखिया कुंकुम का छापा लगाकर कंडवारे नजर करता था। इसके बाद शाम को अन्नकूट महोत्सव का आयोजन किया जाता था। इस दिन तीनों बड़े मंदिरों में से किसी एक के पूजारी को पूजा करने और भगवान बृजनाथ जी को अन्नकूट का भोग लगाने के लिए राजपरिवार की ओर से आमंत्रित किया जाता। मंदिर के पुजारी जब शाम को आते तो सबसे पहले वह ठाकुर जी की आरती करते। ठाकुर जी के सामने अन्नकूट की तरह-तरह की सामग्री चौक में जमाई जाती। आरती के बाद अन्नकूट लुटाने का हुक्म होता था।
ऐसे लुटाया जाता था अन्नकूट
अन्नकूट का प्रसाद लेने के लिए राजपरिवार, रियासत के प्रमुख लोग और कोटा राज्य की प्रजा शाम से ही बृजनाथ जी मंदिर में इक_ा होने लगती। पूजा के बाद पुजारी भगवान बृजनाथ को अन्नकूट का भोग लगाते। इसके बाद नेगी और भेरूलाल अन्नकूट के ठौर से गूजा लेते थे, फिर जाटव अन्नकूट लुटाते थे। यह वो दौर था जब देश के कई हिस्सों में जाति प्रथा चरम पर थी, लेकिन कोटा रियासत में अन्नकूट महोत्सव के जरिए इसे तोडऩे की कोशिश हुई। राजपरिवार इन्हें सम्मान के साथ अन्नकूट लुटाने का हक देता था।
महाराव भीम सिंह ने किया था बदलाव
1707 से 1720 ईस्वी के बीच कोटा के राजा रहे महाराव भीम सिंह प्रथम ने बल्लभ संप्रदाय अंगीकार कर लिया था। इसके बाद उन्होंने कोटा के राजमहल में ही इस संप्रदाय के आराध्य माने जाने वाले भगवान बृजनाथ जी का मंदिर बनवाया। गोवर्धन और अन्नकूट ही नहीं होली और श्री कृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाता। महाराव भीम सिंह प्रथम ने ही धार्मिक उदारता का परिचय देते हुए इन मौकों पर राजपरिवार की ओर से दलितों को सीधे राजमहल और राजदरबार तक आने का ही नहीं अन्नकूट लुटाने का अधिकारी दिया।
Published on:
27 Oct 2019 05:11 pm
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