
जनता करे पुकार, सिर से गुजर गया पानी, अब तो बचा लो सरकार
Opinion : के. आर. मुण्डियार
औसत से थोड़ी अधिक बरसात ने ही कोटा प्रशासन के इंतजामों की पोल खोल कर रख दी है। दस दिन पहले जलमग्न हुई बस्तियों व कॉलोनियों से पानी निकासी को लेकर प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। बरसाती पानी से घिरे परिवारों का दर्द आंसू बनकर टपक रहा है। अतिवृष्टि से उपजे हालात ने आपदा सिस्टम की कार्यप्रणाली को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।
बड़ा सवाल यह है कि आखिर प्रशासन ने मानसून आने से पहले प्रभावी तैयारियां क्यों नहीं कीं? नगर निगम, सार्वजनिक निर्माण विभाग, विद्युत सहित अन्य विभागों के समन्वय से नियंत्रण कक्ष मानसून आने से पहले शुरू नहीं किए। कोटा शहर की तरह जिले के रामगंजमंडी सहित अन्य उपखण्डों में भी नियंत्रण कक्ष शुरू करने में ढिलाई हुई।
निकायों में आपदा बचाव के उपकरण भी पहले नहीं खरीदे गए। इससे साफ जाहिर होता है कि कोटा के अफसर आपदा से निपटने के लिए बिल्कुल भी तैयार ही नहीं थे। यह तो गनीमत रही कि बरसात थम गई, जिससे लोगों को थोड़ी राहत मिली। अन्यथा कोटा शहर समेत अन्य कस्बों में चहुंओर हाहाकार मच सकता था। लापरवाह अफसरों ने मौसम विभाग की भारी बरसात की चेतावनी के बाद भी आमजन को प्रभावी तरीके से अलर्ट नहीं किया। पानी के बहाव क्षेत्रों में बस्तियों के लोगों को अन्यंत्र स्थानांतरित किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बरसाती नालों की सफाई करवाने में दोनों नगर निगम की ओर से लापरवाही रही। बरसाती नालों में निकाले मलबे व कचरे को सड़कों पर ही इसलिए छोड़ दिया गया, ताकि बारिश के पानी से कचरा नालों में गिरकर बह जाए और ठेका फर्म को मुफ्त का पैसा मिल जाएं। कचरा संग्रहण-परिवहन व नालों की सफाई में खानापूर्ति करने वाली ठेका फर्म के बिलों का अब कुछ समय बाद भुगतान कर दिया जाएगा। अहम सवाल यह है कि आखिर नकारा ठेका फर्म व सालों से अपनी कुर्सी बचा रहे अफसर कोटा कीजनता को कब तक मूर्ख बनाते रहेंगे।
यूडीएच मंत्री शांति धारीवाल के गृह क्षेत्र में सिस्टम की ऐसी ढिलाई चिंताजनक है। कोटा राज्य का तीसरा बड़ा शहर हैं, लेकिन यहां के निकायों में पार्षदों की ही सुनवाई नहीं हो रही। कोटा शहर समेत पूरे संभाग में 1000 से अधिक सड़कें क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। कोटा शहर कई जगहों पर खुदा पड़ा है। हर सड़क दर्द से कराह रही है। दुपहिया वाहन चालक गड्ढों में गिरकर चोटिल हो रहे हैं। बिगड़े हालात देखकर ऐसा लगता है कि विकास एजेंसियां धूल में लट्ठ चलाने जैसा काम कर रही है। दोनों नगर निगम में नए बोर्ड बनने के दौरान यूडीएच मंत्री ने निर्वाचित दोनों महापौर एवं पार्षदों से कहा था कि नए बोर्ड ऐसे काम करें, जिससे जनता की तकलीफें कम हो सके और राहत के दोगुने काम किए जाएं, नहीं तो जनता माफ नहीं करेगी। मंत्रीजी की नसीहत पर दोनों महापौर व निकाय अफसर प्रभावी अमल कब करेंगे? कोटा की जनता को इसका इंतजार है।
Published on:
13 Aug 2021 03:22 pm
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