कोटा. राजस्थान के जैसलमैर के छोटे से गांव बरना में जन्मे गाजी खान आज किसी पहचान के मोहताज नहीं है। अभावों में पले-बड़े इस कलाकार को परम्परागत लोक संगीत मांगणियार और खड़ताल दोनों ही अपनी पीढिय़ों से विरासत में मिला। इस पर रियाज और आवाज का मेल हुआ, तो राजस्थान के यह मांगलियार संगीत सात समुन्दर पार ऐसा प्रसिद्ध हुआ कि भाषायी सीमाएं भी बौनी रह गई। बुलन्द सुरीली आवाज के साथ सुर, ताल का ऐसा जादू चला, कि विदेशी भी झूम उठे। गाजी विदेशों में अब तक 279 शो कर चुके हैं। इसके अलावा बालीवुड में भी वह गीत गा चुके हैं, यहीं नहीं देश-विदेश की नामचीन हस्तियों के साथ स्टेज शो भी कर चुके है। पेश है आवाज के जादूगर गाजी खान से पत्रिका की विशेष बातचीत के प्रमुख अंश…
ख्यातनाम लोक गायक गाजी ने बताया कि मांगणियार जाति का यह पेशेवर संगीत उन्हें उनके पुरखों से मिला। खड़ताल व संगीत उन्होंने पिता चूगे खान से सीखा। उन्होंने कहा कि उनके पुरखे राजा-महाराजाओं व मारवाड़ी घरानों में होने वाले सभी आयोजनों में नौ रसों के यहां संगीत गाते-बजाते थे। जब वह छोटा थे, तो रूपायण संस्थान की कोमल कोठारी ने उनका गाना सुना और लगातार उनकी हौंसला अफजाई से आज में इस मुकाम पर हूं।
गाजी ने कहा कि दुनिया में साढ़े तीन तरह के वाद्य यंत्र है। इसमें पहले ठोक कर बजाने वाले, दूसरे फूंक मारकर बजाने वाले और तीसरे मरोड़ कर बजाए जाने वाले, जबकि खड़ताल आधा वाद्य है। शीशम की लकड़ी के चार टुकड़ों से बनने वाले इस वाद्य यंत्र में सुर नहीं होता, केवल ताल ही होता है। अन्य वाद्य यंत्रों व गायन के साथ यह लोक संगीत में चार चांद लगा देता है।
विदेशों में धूम, राजस्थान में हो रहा कम –
उन्होंने बताया कि राजस्थान के इस मांगणियार संगीत को विदेशों में खूब पसन्द किया जा रहा है, वहीं राजस्थान में धीरे-धीरे लोक संगीत कम हो रहा है। बालीवुड के संगीत में लोक संगीत गुम सा होता जा रहा है। इस पर सरकार की ओर से कला को बचाने व कलाकारों को बढ़ाने के प्रयास नहीं होने से नई पीढ़ी की इसमें रूचि भी कम हो रही है। सरकार को कला को बढ़ावा देने के लिए कलाकारों को सुविधाएं देनी चाहिए। मैंने इसे पहचान देने के लिए पहचान लोक संगीत संस्थान भी बनाया। लोक कला को बचाने के लिए हर प्रयास किया, लेकिन बजट के अभाव में आखिर यह बंद हो गया।