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साहब तावड़ों तपबा लाग ग्यों , कम से कम टाइम ही बदलवा दो

साहब तावड़ों तपबा लाग ग्यों, भरी दुपहरी मं तो हालत खराब हो जाव छ। मजदूर दनभर गर्मी में कंस्या काम कर। छाया क लेख टेंट भी कोई न। कम से कम टाइम ही बदलवा दो। कुछ इसी तरह की पीड़ा गर्मी बढऩे के साथ ही मनरेगा कार्य स्थलों पर सुनाई देने लगी है

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साहब तावड़ों तपबा लाग ग्यों , कम से कम टाइम ही बदलवा दो

साहब तावड़ों तपबा लाग ग्यों , कम से कम टाइम ही बदलवा दो

मनरेगा कार्य स्थलों पर छाया-पानी का टोटा, धूप में तपने लगे मनरेगा श्रमिक
सांगोद (कोटा) साहब तावड़ों तपबा लाग ग्यों, भरी दुपहरी मं तो हालत खराब हो जाव छ। मजदूर दनभर गर्मी में कंस्या काम कर। छाया क लेख टेंट भी कोई न। कम से कम टाइम ही बदलवा दो। कुछ इसी तरह की पीड़ा गर्मी बढऩे के साथ ही मनरेगा कार्य स्थलों पर सुनाई देने लगी है। बढ़ती गर्मी के साथ ही तापमान रिकॉर्ड तोड़ रहा है। भीषण गर्मी में जहां लोगों का घरों में रहना मुहाल होने लगा है, उस स्थिति में क्षेत्र के सैकड़ों लोग खुले आसमान तले आग उगलती सूर्य की किरणों के बीच दिनभर मजदूरी कर रहे है। अपने परिवार की रोजी रोटी के बंदोबस्त के लिए मनरेगा योजना में मजदूरी कर रहे श्रमिकों की गर्मी बढऩे के साथ ही कार्य स्थलों पर हालत खस्ता होने लगी है। सरकार के स्तर से अभी तक समय परिवर्तन को लेकर कोई कवायद नहीं दिख रही। दिनभर धूप में काम कर श्रमिकों की तबियत बिगडऩे की आशंका सताने लगी हैं।

समय में हो बदलाव : बढ़ती गर्मी के साथ ही मनरेगा के समय में परिवर्तन की मांग श्रमिक करने लगे हैं। श्रमिकों का कहना हैं कि सरकार हर साल अप्रेल माह की शुरूआत में मनरेगा के समय में बदलाव करती है, लेकिन इस बार अभी तक समय नहीं बदला। श्रमिक कार्य स्थलों पर सुविधाओं की कमी के बीच दिनभर खुले आसमान तले मजदूरी करने को मजबूर हैं। सिर पर तपती धूप और पैरों में तपती धरा पर हाड़तौड़ मजदूरी कर रहे ऐसे सैकड़ों श्रमिक काम के दौरान कभी पेड़ों की छांव तलाशते हैं तो कभी बार बार सूखते गले को तर करने के लिए गर्म पानी पीकर अपना गुजारा कर रहे हैं।

कई जगह तो टैंट भी नहीं : मनरेगा की शुरूआत के बाद वर्ष 2008-09 में सरकार ने पंचायतों में कार्य स्थलों पर छाया की सुविधा के लिए टैंट वितरित किए। दो तीन सालों तक तो कार्य स्थलों पर टैंट लगे, लेकिन अब यह अधिकांश जगहों पर नहीं लगते। कई पंचायतों में तो टैंट फटकर नष्ठ हो चुके है। मजबूरन कार्य स्थलों पर श्रमिकों को पेड़ों की छांव तले आराम करने पर विवश होना पड़ता है। टेंटों के अभाव में श्रमिकों को काफी परेशानी हो रही है।