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Special Story: जिन किलों को तोपे भी नही भेद सकती थी वह आज अपनी मरहम पट्टी को भी तरसे…जानिए तीन सौ साल प्राचीन किले का इतिहास

रजवाड़ो के समय सुरक्षा कवच रहे परकोटो को तोपे भी भेद नही सकती थी।

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Suraksha Rajora

Apr 09, 2019

 

कोटा/रोटेदा. रजवाड़ो के समय सुरक्षा कवच रहे परकोटो को तोपे भी भेद नही सकती थी। उन सुरक्षा कवचों को सुरक्षा का मरहम नही मिल पा रहा है। यह धरोहरे वक्त की मार के घावों में जीर्ण शीर्ण होकर धराशाही होती जा रही है। रोटेदा कस्बे में स्थित किला पिछले 85 साल से मिट्टी पर खड़ा हुआ है। यहां से गुजरने वाले लोग इसे मिट्टी के किले के नाम से भी जानने लगे है।

 

इतिहासकारो के मुताबिक किला तीन सौ साल से ज्यादा पुराना है। इस किले का निर्माण कापरेन के जागीदार दीपसिंह ने करवाया था।उन्होंने अपने आप को राजा घोषित कर दिया था। इस पर बूंदी के हाड़ा वंश ने उन पर आक्रमण कर दिया था। उसके बाद दीपसिंह उदयपुर चले गए। तब से यह किला वीरान पड़ा है। किले की दीवारों का प्लास्टर उखड़ चुका है। जिससे परकोटे की दीवारें जख्मी हो चुकी है। किले में जगह जगह बिलायती बम्बूल उग आए है।

 

स्थापत्य कला व पुरातत्व महत्व के बेजोड़ प्रतीक परकोटा कहि धराशाही हो रहा है। गत दिनों यहाँ जेसीबी से किले के अंदर उगे बम्बूलो को तो हटा दिया परन्तु परकोटो की किसी ने सुध नही ली।

 

 

तीन मंजिला किला,10 फिट की नींव,अंदर बने है मन्दिर


किले का क्षेत्रफल लगभग एक बीघा है।इसे एक नजर देखने पर यह जमीन से 13 फीट की ऊँचाई तक मिट्टी पर खड़ा दिखाई देता है।उसके बाद 10 फिट ऊँचाई में किले की नींव दिखाई देती है।जिसके बाद किले की दीवार शुरू होती है।किला तीन मंजिला बना हुआ है।जिसके अंदर झरोखे व तिबारिया बनी हुई है।किले का मुख्य गेट अभी भी मजबूत है। अंदर इसमे बरामदे बने है।

 

वही किले के परकोटे में अंदर दीवारों के सहारे भगवान देवनारायण का मंदिर, अन्नपूर्णा माता मंदिर एंव सूफी संतों की मजार का चिल्ला वर्तमान में भी बना हुआ है। जहां लोग पूजा अर्चना कर मन्नते मांगते है। वही जैन मंदिर,जगन्नाथ मंदिर आदि की मूर्तियां वर्षो पूर्व चोर ले उड़े।वही परिसर में रजवाड़ो के समय का एक कुआ भी है। जो देख रेख के अभाव में बम्बूलो से ढका पड़ा है। किले में एक सुरंग भी है।जिसका उपयोग शत्रु द्वारा पराजिता झेलने पर किया जाता था।


बुजुर्ग ग्रामीणों के मुताबिक इस प्रकार रहा है किले का इतिहास


बूंदी के हाड़ा वंश ने जब दीपसिंह की चर्चाएं सुनी तो उन्होंने किले पर आक्रमण की रूपरेखा तैयार की। बूंदी दरबार सेनापति एंव तोपो के साथ किले को फतह करने निकल पड़े। बूंदी नरेश ने रोटेदा से एक किमी दूर से किले पर आक्रमण किया था। उस जगह को लोग आज भी मोर्चा के नाम से जानते है। उस समय दीपसिंह का सेनापति बूंदी नरेश के सम्पर्क में आ चुका था।

 

उसने अपने राजा को पराजित करने में बूंदी दरबार का सहयोग किया। और उसने तोपो में सन के गोले( बारूद समाप्त होने पर चलाने वाला गोला) डालकर हाड़ा वंश पर आक्रमण किया। इससे हाड़ा वंश के सेनापति को पता लग गया कि दीपसिंह के पास गोला बारूद समाप्त हो चुका है। फिर उन्होंने ने किले को घेर लिया। और राजा दीपसिंह गुप्त सुरंग से निकलकर उदयपुर चला गया।सुरंग आज भी किले में स्थित है। जो इस बात का प्रमाण है।


दो वर्ष पूर्व ढही थी दीवार,तब से बंद है रास्ता


करीब दो वर्ष पूर्व धाकडो के मोहल्ले से चम्बल नदी की ओर जाने वाले कच्चे रास्ते पर अचानक किले की दीवार गिर गई थी।जिसे अनदेखी करते हुए आज भी किसी ने सुध नही ली।जिससे यह रास्ता आज भी बंद पड़ा है।