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video : अब खिलाडिय़ों का एक्शन बता देगा इंजरी की आशंका

खेल चिकित्सा: चोट से बचाने के लिए खेलने के तरीकों में होगा सुधार, डोपिंग के लिए खिलाडिय़ों से ज्यादा ट्रेनर को बताया जिम्मेदार

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Indian Orthopaedic Association (IOA) 16th annual conference of the central zone

कोटा. चोट के चलते भारतीय खिलाडिय़ों को वक्त से पहले मैदान नहीं छोडऩा पड़ेगा। क्रिकेट और हॉकी टीम का हिस्सा बनने के बाद स्पोर्टस एक्शन का आंकलन होगा, ताकि खेलने के तरीके से भविष्य में होने वाली इंजरी की आशंका पता चल सके। चिकित्सक की रिपोर्ट पर टीम प्रबंधन खिलाडिय़ों का एक्शन सुधारेगा।

इंडियन ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन (आईओए) सेंट्रल जोन की 16वीं वार्षिक कॉन्फ्रेंस "सेजकॉन" में शामिल होने कोटा आए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) और हॉकी टीम के सलाहकार डॉ. एमएस ढिल्लन ने राजस्थान पत्रिका से विशेष बातचीत में बताया कि खिलाडिय़ों को चोट से उबारने के लिए रोडमैप बना है।

इसमें खिलाडिय़ों का गेट और इन्फ्रारेड मोशन एनालिासिस होगा। गेट के जरिए डॉक्टर पता कर सकते हैं किस एक्शन का प्रेशर शरीर के किस हिस्से पर पड़ रहा है।

मोशन एनालिसिस में खिलाडिय़ों की हर गतिविधि का इन्फ्रारेड तकनीक से मुआयना होगा। इससे पता चलेगा कि खिलाड़ी इंजरी प्रोन तो नहीं, यदि है तो किस एक्शन से कौन सा अंग प्रभावित होगा? दोनों रिपोर्ट के आधार पर उनके एक्शन और खेलने के तरीके में सुधार किया करेंगे।

खेल की पढ़ाई में शामिल हो डोपिंग

डॉ. ढिल्लन ने कहा, भारतीय टीम का हिस्सा बनते ही खिलाडिय़ों और ट्रेनर को प्रतिबंधित दवाओं और खानपान की सूची दी जाती है। डोपिंग में फंसने पर कोई यह कहे कि उसे जानकारी नहीं थी तो यह गलत है। हालांकि जागरुकता की कमी जरूर है। स्कूल स्तर से ही इस बारे में जानकारी देनी चाहिए।

हाईटेक हुई डोपिंग

डॉ. ढिल्लन ने बताया, डोपिंग हाईटेक हो चुकी है। क्षमता बढ़ाने वाली प्रतिबंधित दवाएं लेने के बाद जांच में खुलासा न हो इसके लिए भी दवाएं बन गई हैं। विकसित देश के खिलाडिय़ों ने तो मेडिकल डोपिंग को पीछे छोड़ दिया है।

वहां अब ब्लड डोपिंग होने लगी है। जब खिलाडिय़ों के खून में ऑक्सीजन और ऊर्जावान तत्वों की अच्छी मात्रा होती है उनका खून निकाल लिया जाता है। प्रैक्टिस में ताकत जाया करने के बाद खिलाड़ी मैडल जीतने उतरता है तो खून को वापस चढ़ा दिया जाता है।

देशभर के 300 डॉक्टर कोटा में जुटे

कोटा। इंडियन ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन (आईओए) सेंट्रल जोन की 16वीं वार्षिक कॉन्फ्रेंस शनिवार से कोटा मेडिकल कॉलेज में शुरू हुई। दो दिवसीय कॉन्फ्रेंस के पहले दिन शनिवार को देश-विदेश से आएं 32 डॉक्टर्स ने घुटने, कंधे, पेल्विक बोन, जन्मजात हड्डी रोग, बोन कैंसर, फ्रैक्चर, ज्वाइंट रीप्लेसमेंट पर चर्चा की। कॉन्फ्रेंस में 300 डॉक्टर्स आए हैं।

इस दौरान प्रोफेसर डॉ. आरपी मीणा ने बताया कि कैडेवर पर शोल्डर रिप्लेंसमेंट सर्जरी का सीधा प्रसारण किया गया। उत्तरी भारत में कैडेवर पर यह पहली सर्जरी है।

बोन बैंक के लिए तेज करेंगे प्रयास

उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि सांसद ओम बिरला ने कहा, हड्डी रोगों के इलाज में उपयोगी बोन बैंक कोटा में शुरू करने के प्रयास करेंगे। इसके लिए जो भी जरूरत होगी पूरी की जाएगी।

विशिष्ट अतिथि विधायक संदीप शर्मा, हीरालाल नागर, चंद्रकांता मेघवाल और मेडिकल कॉलेज प्राचार्य डॉ. गिरीश वर्मा थे। चेयरमेन डॉ. मोहन मंत्री, सचिव डॉ. राजेश गोयल, आईएओ अध्यक्ष डॉ. एसएन सोनी ने अतिथियों का स्वागत किया।

एक डॉक्टर चाहे तो शुरू हो सकता है बोन बैंक: डॉ. चौधरी

सूरत में 8 साल से बोन बंैक चला रहे डॉ. राजीव राज चौधरी ने बताया कि एक डॉक्टर के डेडीकेशन से बोन बैंक शुरू हो सकता है। हमारा बोन बैंक पैथोलॉजी लैब के साथ चल रहा है। कोटा में ब्लड बैंक के साथ शुरू कर सकते हंै।

डॉ. चौधरी ने बताया, हम ब्रेन डेड मरीजों और सर्जरी के बाद वेस्ट हड्डियों से बोन बैंक चला रहे हैं। वेस्ट बोन को एचआईवी, एचबीएसएजी जैसे टेस्ट के बाद टाटा मेमोरियल भेजते हैं। वहां उससे एंटीजन निकाले जाते हैं। इसे भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में स्टरलाइज करवाते हैं। इसके बाद हड्डी मरीज को लगा सकते हैं। प्रॉसेसिंग के बाद हड्डी पांच साल खुले में रख सकते हैं। यह कैंसर, एक्सीडेंट पीडि़तों, कूल्हा प्रत्यारोपण में मददगार है।

महिलाए में कंधे की बीमारी ज्यादा: डॉ. अग्रवाल

उत्तर भारत में सबसे ज्यादा शोल्डर रीप्लेसमेंट करने वाले डॉ. रमनकांत अग्रवाल ने बताया, कंधे की बीमारियां बचपन से शुरू हो जाती हैं। बिना चोट लगे भी समस्या हो सकती है। महिलाओं में फोजन शोल्डर और रोटेटर कफ बड़ी समस्या है। हालांकि 60 फीसदी मरीज 2 से 3 साल में ठीक हो जाते हैं। लेकिन समस्या ज्यादा होने पर डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

सेरेबल पाल्सी में पोटोन थैरेपी फायदेमंद: डॉ. नागदा

मुबंई से आएं डॉ. तरल नागदा ने बताया कि सेरेबल पाल्सी (मस्तिष्क पक्षाघात) में पोटोन थेरेपी से फायदा होता है। सेरेबल पाल्सी के बावजूद कई बच्चों का मस्तिष्क ठीक काम करता है, लेकिन हाथ-पैर विकृति होने से एक्टिव नहीं हो पाते। पोटोन थेरेपी में निडिल से मांसपेशी में दवा डाल दी जाती है। इसमें हड्डियों की अकडऩ कम हो जाती है।

15 मिनट में आ जाती है एंबुलेंस: डॉ. आर्य

किंग्स मेडिकल कॉलेज लंदन और ब्रिटिश इंडियन ऑर्थोपेडिक सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. आनंद आर्य ने बताया, ट्रोमा केसेज में मरीजों को गोल्डन हॉवर में इलाज मिलना चाहिए। ब्रिटेन में हर दस किमी पर एंबुलेंस उपलब्ध होती है जिनमें माइनर ऑपरेशन भी हो सकता है। बड़े अस्पतालों में हेलीपैड बने हैं।